फकीरी
असल फकीरी और।
असली छोड़ नकल कर बैठा,
सब ही मन के चोर ॥ टेर ॥
त्याग भाग लक्षणा लीना,
ज्याँरे दिल बिच ऊगा भोर।
समझ सूँ समझ रमझ कर लीनी,
दे डंके पर ठोर ॥
ज्याँरी लहर जगत क्या जाने,
मिले चोर सूँ चोर।
धर पाखण्ड दण्ड कई भाँति,
जावे वां संग दौर ॥
मन मुदड़ा मिल मस्त रहे वें,
बाँने न परवा और।
चाहे बिगड़े और चाहे रहे जग,
निरख लियो निज जोर ॥
नाम संन्यस्त गृहस्थ सूँ बदतर,
कर रह्या होडा होड।
अपनी अपनी खेंच खेंच कर,
रह गये ज्यूँ त्यूँ मोड ॥
त्याग ग्रहण उनके कछु नाँही,
वाद विवाद न झौर।
अपनो स्वरूप परख लियो आप ही,
जैसे चंद्र चकोर ॥
वाचक ज्ञान बके बहुतेरा,
उपनिषद् पर जोर।
अपनी आपकी सूझी नाँही,
यों ही रहे निकोर ॥