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Friday, July 24, 2026

फकीरी 

असल फकीरी और।

असली छोड़ नकल कर बैठा,

 सब ही मन के चोर ॥ टेर ॥

त्याग भाग लक्षणा लीना, 

ज्याँरे दिल बिच ऊगा भोर।

समझ सूँ समझ रमझ कर लीनी,

 दे डंके पर ठोर ॥

ज्याँरी लहर जगत क्या जाने, 

मिले चोर सूँ चोर।

धर पाखण्ड दण्ड कई भाँति, 

जावे वां संग दौर ॥

मन मुदड़ा मिल मस्त रहे वें, 

बाँने न परवा और।

चाहे बिगड़े और चाहे रहे जग, 

निरख लियो निज जोर ॥

नाम संन्यस्त गृहस्थ सूँ बदतर, 

कर रह्या होडा होड।

अपनी अपनी खेंच खेंच कर, 

रह गये ज्यूँ त्यूँ मोड ॥

त्याग ग्रहण उनके कछु नाँही,

 वाद विवाद न झौर।

अपनो स्वरूप परख लियो आप ही,

 जैसे चंद्र चकोर ॥

वाचक ज्ञान बके बहुतेरा,

 उपनिषद् पर जोर।

अपनी आपकी सूझी नाँही, 

यों ही रहे निकोर ॥