Wednesday, June 10, 2026

ब्रम्ह रूप अवतार हो ,

ब्रम्ह रूप अवतार हो ,

जग में सृजनहार। 

चारों युगों में गूँजती 

तुम्हरी जय जय कार। 


योगसिद्धा भुवना तनय ,

वसु प्रभास के अंश। 

देवाचार्य  देवशिल्पी 

जगत करत  प्रसंश। 


सतयुग में तो स्वर्गलोक ,

त्रेता में लङ्का  नगरी। 

द्वापर में रची द्वारिका 

चकित बई हे नगरी।


कालदण्ड यमराज का ,

रचा इंद्र का वज्र। 

शिवजी का त्रिशूल रचा ,

रचा सुदर्शन चक्र। 


लौह ताम्ब्र और स्वर्ण शिला ,

काष्ट शिल्प है धर्म।

पञ्च शिल्प प्रदाता है।,

नित्य सवाँरे कर्म। .

दिवस आज प्राकट्य है  ,

निवण करूँ सरकार । 

लाज आप के हाथ है ,

भव से करियो पार। .

Lyrics By AVIRAJ

बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी ।*

*योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत ।*

*प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य तु ॥*

*विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः।*

*कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वार्धकिः॥*

- (विष्णुपुराण/प्रथमांश:/अध्याय -१५, श्लोक - ११८-११९)