ब्रम्ह रूप अवतार हो ,
जग में सृजनहार।
चारों युगों में गूँजती
तुम्हरी जय जय कार।
योगसिद्धा भुवना तनय ,
वसु प्रभास के अंश।
देवाचार्य देवशिल्पी
जगत करत प्रसंश।
सतयुग में तो स्वर्गलोक ,
त्रेता में लङ्का नगरी।
द्वापर में रची द्वारिका
चकित बई हे नगरी।
कालदण्ड यमराज का ,
रचा इंद्र का वज्र।
शिवजी का त्रिशूल रचा ,
रचा सुदर्शन चक्र।
लौह ताम्ब्र और स्वर्ण शिला ,
काष्ट शिल्प है धर्म।
पञ्च शिल्प प्रदाता है।,
नित्य सवाँरे कर्म। .
दिवस आज प्राकट्य है ,
निवण करूँ सरकार ।
लाज आप के हाथ है ,
भव से करियो पार। .
Lyrics By AVIRAJ
बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी ।*
*योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत ।*
*प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य तु ॥*
*विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः।*
*कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वार्धकिः॥*
- (विष्णुपुराण/प्रथमांश:/अध्याय -१५, श्लोक - ११८-११९)