साधो ! हरि गुरु अन्तर नाहीं ।
मो मन एक रहाई,
साधो हरि गुरु अन्तर नाहीं । ।।
हरि ही गुरु, गुरु हरि कहिये,
हरि में गुरु समाई।
हरि-गुरु में अन्तर जो समझे,
ते नर नरक गिराई ||१ ||
साधो ! हरि गुरु अन्तर नाहीं ।
हरि ही गुरु होय अवतरे हैं,
जीव जगावन आई ।
चेतन देव सदा शुद्ध कहिये,
छिन्न-भिन्न कछु नाहीं ॥ २ ॥
साधो ! हरि गुरु अन्तर नाहीं ।
जो जाने सो जाने यह गति,
निज निश्चय मन माँही ।
आपा छोड़ आप में देखे,
भरम-ग्रन्थि नहीं काई ।।३।।
साधो ! हरि गुरु अन्तर नाहीं ।
देवनाथ हैं शुद्ध संन्यासी,
जिन यह बूँटी पाई।
मानसिंह सपने नहीं दूजो,
एक रूप दरसाई ।।४ ।।
साधो ! हरि गुरु अन्तर नाहीं ।