Thursday, July 16, 2026
Wednesday, July 8, 2026
कनकधारा स्तोत्रम
अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती
भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला
मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।
मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै:
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या
सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द
हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर
सहोदरमिन्दिराय:।।3।।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम
निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम
भुजंगरायांगनाया:।।4।।
बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला
कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे
स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे
दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।
प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य
भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च
मकरालयकन्यकाया:।।7।।
दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम
स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण
प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।
इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया
त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि
कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।
गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति
शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै
नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।
श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै
नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै
नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।
नमोस्तु नालीक निभाननायै
नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै
नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।
सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि
साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव
मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।
यत्कटाक्षसमुपासना विधि:
सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां
मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।
सरसिजनिलये सरोज हस्ते
धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।
दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी
विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ
गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।17।।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं
त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।। ।।
इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
दर्शन देता जाइजो जी,
सतगुरु मिलता जाइजो जी।
म्हारे पिवरिया री बातां
थोड़ी म्हने,केता जाइजो जी॥
सोने जेडी पीळी पड़ गई,
दुनिया बतावे रोग।
रोग दोग म्हारे काई नी लागे,
गुरु मिलण रो जोग॥
म्हारे भाभे म्हने बींद बतायो,
पकड़ बताई बाँह।
कांई कहो में कांई न समझू,
जिव भजन रे माय॥
म्हारे देश रा लोग भला है,
पेहरे कंठी माला।
म्हारा लागे वे भाई-भतीजा,
राणाजी रा साला॥
सासरियो संसार छोडियो,
पीव ही लागे प्यारो।
बाई मीरा ने गिरधर मिलिया,
चरण कमल लिपटायो॥
Sunday, July 5, 2026
#जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै ।
| 98797--97-79-9-768857 जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै । ता दिन तेरे तन-तरुवर के सबै पात झरि जैहैं । या देही कौ गरब न करियै, स्यार-काग-गिध खैहैं । तीननि में तन कृमि, कै विष्टा, कह्वै खाक उड़ैहै । कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा कहँ रँग-रूप दिखैहै । जिन लोगनि सौं नेह करत है, तेई देखि घिनैहैं । घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होइ धर खैहैं । जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैं । तेई लै खोपरी बाँस दै, सीस फोरि बिखरैहैं ! अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, संतनि मैं कछु पैहै । नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं, जम की मार सो खैहै । सूरदास भगवंत-भजन बिनु बृथा सु जनम गँवैहै ॥2॥ 76777454354324414535535 |
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वारी ओ गुरुदेव आपने बलिहारी
| वारी ओ गुरुदेव आपने बलिहारी आप नई होता जगत में कुण करतो मरी साय भोगता दुःख भारी वारी ओ गुरुदेव आपने बलिहारी असंग जुगां को सुतो मारो हंसलो सद्गुरु दियो जगाई शब्द की सिसकारी वारी ओ गुरुदेव आपनेबलिहारी गुरु बिन अँधा जाणिये नहीं हे आतम ज्ञान जगत पच हारी वरि ओ गुरुदेव आपने बलिहारी यम से झगड़ा जीत कर सुख सागर के माही भयो आनंद भारी वारी ओ गुरुदेव आपने बलिहारी फूलगिरि की विनती दुर्बल करे पुकार अरज सुण मारी वारी ओ गुरुदेव आपने बलिहारी |
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"हद में तो दाता खेल रचायो"
हद में तो दाता खेल रचायो,
एजी बेहद माँहिने तो आप फिरे,
अधर धार पर आसन मांड्यो,
धरा अधर बीच मौज करे,
एजी हँसा रहवे जो हँसा में बैठे,
कागा के संग नहीं फिरे,
हंसलो रवे जो हँसा में बैठे,
कागा के संग नहीं फिरे,
नुगरा नर तो परे भटकता,
खोजी होवे सो तो खोज करे,
अमर जड़ी तो गुरु दाता सूं पाई,
राम नैना सूं वा तो नेड़ी रे फिरे,
वणी रे बूंटी रा परहेज नी पाया,
वणा सूं करोड़ां कोस परे,
समरथ गुरु जी री शरणां पड्या जो,
ओगत गाता गेला करे,
गुरु रे ज्ञान पारस नहीं पीधो,
वणा जिव्हा ने काळ चरे,
गरबीला नर गुलचा ही खावे,
एजी समझा जावे जो समंद तिरे,
जीवतड़ा तो जले मसाणा,
मुर्दा व्हे जो मगन फिरे,
रण माँ चो सुरता गाथे,
कायर हुवे जो देख डरे,
कहे धरव दयाल के शरणे,
करोड़ जनम रा पाप झड़े,
हद में तो दाता खेल रचायो,
एजी बेहद माँहिने तो आप फिरे,
अधर धार पर आसन मांड्यो,
धरा अधर बीच मौज करे,
दम इश्क़ का भरने वालो को
घरबार लुटाना पड़ता है
इंकार तो करना क्या शह है
लब तक ना हिलना पड़ता है
ए दोस्त मुहब्बत क्या शह है
ये बात तुम्हे मालूम नहीं
खुद अपने हाथों से अपनी
मय्यत को उठाना पड़ता है
दम इश्क़ का भरने वालो को
घरबार लुटाना पड़ता है
न काम मुहब्बत की आहें
जब अर्श से टकरा जाती है
तो पर्दानशी को परदे से
खुद सामने आने पड़ता है
दम इश्क़ का भरने वालो को
घरबार लुटाना पड़ता है
जब इश्क़ का सौदा होता है
हस्ती को मिटाना पड़ा है
माशूक का हार एक जुल्मो सितम
हंस हंस के उठाना पड़ता है
दम इश्क़ का भरने वालो को
घरबार लुटाना पड़ता है
ये इश्क़ ए दिल खेल नहीं
इसमें तो यही सब होता है
एक बार अगर वो रूठे तो
सौ बार मानना पड़ता है
दम इश्क़ का भरने वालो को
घरबार लुटाना पड़ता है
जावा दो सहेलियां म्हाने
शिवजी लडेला ये,
जावा दो सहेलियां माने,
औ शिवजी लडेला ये,
मासु राड तो करेला ये,
जावा दो सहेलियां माने।।
चिलम बनाई आई,
भांग में घोटाई आई,
पिवण की वैला,
पिवण की वैला,
शिव याद तो करेला ये,
जावा दो सहेलियां माने,
शिवजी लडेला ये।।
भोजन बणाई आई,
थाली में परोस आई,
जीमण की वैला,
जीमण की वैला,
पिवजी याद तो करेला ये,
जावा दो सहेलियां माने,
शिवजी लडेला ये।।
हरीयो हरीयो गास लाइ,
नांदीया ने डाल आई
घूमने की वैला,
घूमने की वैला,
शिव जी याद तो करेला ये,
जावा दो सहेलियां माने,
शिवजी लडेला ये
ढोलीयो में ढाल आई,
सहेज बिछाई आई,
पोडन की वैला,
शिव जी याद तो करेला ये,
जावा दो सहेलियां माने,
शिवजी लडेला ये।।
कैवै गवरा पार्वती,
शुणो ये सहेलियां मारी,
शिव जी बीना कोई,
शिव जी बीना कोई,
काम नहीं चालेला ये,
जावा दो सहेलियां माने,
शिवजी लडेला ये।।
जावा दो सहेलियां म्हाने,
शिवजी लडेला ये,
जावा दो सहेलियां माने,
औ शिवजी लडेला ये,
मासु राड तो करेला ये
जावा दो सहेलियां माने।।
सिया राम जी का डंका लंका मे
सिया राम जी का डंका लंका मे,
बजवा दिया बजरंग बाला ने।
सूती मंदोतरी सपनो आयो
सपनो में शिवा विस रे,
कूदता देखिया रीछ वानरा ने,
कटता देखिया सीस रे,
सिया राम जी का डंका लंका में,
बजवा दिया बजरंग बाला ने।।
कहे मंदोतरी सुन पिया रावण ,
आ कई कुबुद्ध कमाई रे,
तीन लोक री सीता माँ जानकी,
ज्याने तू हर लाई रे,
सिया राम जी का डंका लंका में,
बजवा दिया बजरंग बाला ने।।
मेघनाथ सा पुत्र हमारे,
कुम्भकरण सा भाई रे,
लंका सरीका कोट हमारे ,
सात समुद्र आडी खाई रे,
सिया राम जी का डंका लंका में,
बजवा दिया बजरंग बाला ने।।
हनुमान सा पायक उनका,
लक्ष्मण जैसा भाई रे,
जलती अगन में कूद पड़े वो,
कोट गिने ना खाई रे,
सिया राम जी का डंका लंका में,
बजवा दिया बजरंग बाला ने।।
रावण मार राम घर आये,
घर घर बटत बधाई जी,
सुनीजन मुनिजन आरती उतारे,
तुलसीदास जस गाई रे।।
चलणो खांडा की धार , ढबणो भाला की आन
चलणो खांडा की धार , ढबणो भाला की आन ,
धार चूके तो अणिया लागे रे ! ये मारग तो झीणा झीणा जी
इन काया में रतन तालाब , संत हिलोरा ले रया जी !
चलणो खांडा की धार , ढबणो भाला की आन
इन काया में लग रही हाट , साध संत सौदा करे ओ जी
चलणो खांडा की धार , ढबणो भाला की आन
इन काया में माची राड , बना शीश का भाला बावे जी!
चलणो खांडा की धार , ढबणो भाला की आन
सूरो वे तो खड्ग संभाल , कायर वे जो डर डर भागे जी
चलणो खांडा की धार , ढबणो भाला की आन
माली लखमा लिखे परमाण , भवानीनाथ जी अड़भै भाखे जी
चलणो खांडा की धार , ढबणो भाला की आन
गजब का दावा है पापियों का ,
अजीब जिद पर सम्हल रहे हैं।
अजीब जिद पर सम्हल रहे हैं।
उन्हीं से झगड़े पर तुले हैं
जिनसे त्रयलोक पल रहे हैं॥
वे कह रहे हैं कि श्यामसुन्दर
अधम उधारण बने कहाँ से,
ख़िताब हमसे नाथ लेकर
हमी से फिर क्यों बदल रहे हैं।
गरीब अधमों के तुम हो प्रेमी
ये बात मुद्दत से सुन रहे हैं,
इसी भरोसे पै तुमसे भगवन्
लड़ रहे हैं मचल रहे हैं।
हमारा प्रण है कि पाप करलें
तुम्हारा प्रण है कि पाप हरलें,
तुम अपने वादे से टल रहे हो
हम अपने वादे पर चल रहे हैं।
नहीं है आँखों कि अश्रुधारा
तुम्हारी उल्फ़त का ये असर है,
पड़े वे पापों के दिल में छले
जो ‘बिन्दु’ बनकर निकल रहे हैं।
लटको जोगी वालो छोड़ दे रे,
अशल फकीरी धार ओ।।
मैं वारी जाऊं रे , बलिहारी जाऊं रे
मैं वारी जाऊं रे ,
बलिहारी जाऊं रे
मारे सतगुरु आंगड़ आया,
मैं वारी जाऊं रे
सतगुरु आंगड़ आया,
हे गंगा गोमती लाया रे
मारी निर्मल हो गयी काया,
मैं वारी जाऊं रे...
सब सखी मिलकर हालो,
केसर तिलक लगावो रे
घड़ी हेत सूं लेवो बधाई,
मैं वारी जाऊं रे
सतगुरु दर्शन दीन्हा,
भाग उदय कर दीन्हा रे
मेरा भरम वरम सब छीना,
मैं वारी जाऊं रे
सत्संगी बन गयी भारी,
मंगला गाऊं चारी रे
मेरी खुली ह्रदय की ताली,
मैं वारी जाऊं रे
दास नारायण जस गायो,
चरणों में सीस नवायों रे
मेरा सतगुरु पार उतारे,
मैं वारी जाऊं रे
मन, मस्त हुआ. फिर क्या बोले
मन, मस्त हुआ. फिर क्या बोले
क्या बोले फिर क्योँ बोले….
हीरा पाया बांध गठरिया….
हे. बार बार वाको क्यों खोले
मन, मस्त हुआ. फिर क्या बोले
हलकी थी. जब चढ़ी तराजू….
हे. पूरी भई तब क्या तोलै
मन, मस्त हुआ. फिर क्या बोले
हंसा पावे मानसरोवर….
हे. ताल तलैया में क्यों डोले
मन, मस्त हुआ. फिर क्या बोले
तेरा साहब है घर माँहीं….
हे बाहर नैना क्यों खोलै
मन, मस्त हुआ. फिर क्या बोले
कहै कबी.र सुनो भाई साधो….
हे. साहिब मिल गया तिल ओले
मैं लखिया अपने आप को मुझे ओर कोई नहीं पाया।
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
तीरथ बरत किया बहुतेरा ,
तासे संकट मिटा नहीं मेरा ,
गुफा बावड़ी जंगल हेरा ,
मंदिर में जपिया जाप रे
वहां कोई नजर नहीं आया। 1
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
योग धारणा धारण करके ,
नेत्र बंद कर ध्यान धरके ,
देख्या छेद स्वांस को भर के ,
देखि ज्योति नभ की रे ,
हैं तत्वों की छाया। 2
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
जिव्हा बिना जाप कर लीन्हा ,
सुरत शबद स्वांशा में दीन्हा ,
तू सुने सो चेतन आप ह्वेन ,
सब तूने खेल बनाया। 3
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
अपने आप और नहीं कोई ,
परमानंद को निश्चय यो ही ,
सदगुरु पूरण पारखी सोइ ,
मेटि त्रिगुणा की तप को ,
सब खाता खतम कराया। 4
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
म्हारी सवा लाख री लूम
म्हारी सवा लाख री लूम
गम गयी इण्डूणी
औ इण्डूणी रे कारणे
म्हारी सासू ताना देय
गम गयी इण्डूाणी
ओ इण्डूणी रे कारणे
म्हारो ससुरा रूसो जाय
गम गयी इण्डूणी
ओ इण्डूणी रे कारणे
गयी नणद कुंआ में कूद
गम गयी इण्डूणी
ओ इण्डूणी रे कारणे
म्हारो देवर लड़े लड़ाई
ओ इण्डूणी रे कारणे
गम गयी इण्डूणी
जिस पर ये दिल फ़िदा है
जिस पर ये दिल फ़िदा है
दिलदार वो है निराला।
हर दिल अजीज भी है
हर दिल का है उजाला॥
क्या है वो क्या नहीं
झगड़ा दूर हो तब।
होता है जब वो जाहिर
परदे में छिप्नेवाला॥
खम्भे से मूर्ती से
जल सिन्धु से जमीं से।
पलभर में निकल आया
जिसने जहाँ निकला।
बंजरों में पहाड़ों में
कतरों में बादलों में।
अदना है ‘बिन्दु” से भी
हैं सिन्धु से भी आला।
गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना।
गुरुदेव दया करके
करूणानिधि नाम तेरा,
सोये हुए भाग्यो को,
मेरी नाव भवर डोले
गुरुदेव दया करके
तुम सुख के सागर हो,
इस तन में समाये हो,
नित्त माला जपूँ तेरी,
गुरुदेव दया करके
पापी हूँ या कपटी हूँ,
घर बार छोड़ कर मैं
दुःख का मार हूँ मैं,
गुरुदेव दया करके
मैं सब का सेवक हूँ,
नहीं नाथ भुलाना मुझे,
तेरे दर का भिखारी हूँ,
गुरुदेव दया करके
हमें निज धर्म पर चलना बताती रोज रामायण।
बताती रोज रामायण।
सदा शुभ आचरण करना
सिखाती रोज रामायण॥
जिन्हें संसार सागर से
उतर कर पार जाना है।
उन्हें सुख से किनारे पर
लगाती रोज रामायण॥
कहीं छवि विष्णु की बाकी,
कहीं शंकर की है झाँकी।
हृदय आनंद झूले पर
झुलाती रोज रामायण॥
सरल कविता कि कुंजों में
बना मंदिर है हिंदी का।
जहाँ प्रभु प्रेम का दर्शन
कराती रोज रामायण॥
कभी वेदों के सागर में
कभी गीता कि गंगा में।
सभी रस ‘बिन्दु’ में मन को
दुबाती रोज रामायण॥