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Sunday, July 5, 2026

दम इश्क़ का भरने वालो को 

     

 दम इश्क़ का भरने वालो को
 घरबार लुटाना पड़ता है
 इंकार तो करना क्या शह है
 लब तक ना हिलना पड़ता है

 ए दोस्त मुहब्बत क्या शह है
 ये बात तुम्हे मालूम नहीं
 खुद अपने हाथों से अपनी
 मय्यत को उठाना पड़ता है
 दम इश्क़ का भरने वालो को
 घरबार लुटाना पड़ता है


 न काम मुहब्बत की आहें
 जब अर्श से टकरा जाती है
 तो पर्दानशी को परदे से
 खुद सामने आने पड़ता है
 दम इश्क़ का भरने वालो को
 घरबार लुटाना पड़ता है

 जब इश्क़ का सौदा होता है
 हस्ती को मिटाना पड़ा है
 माशूक का हार एक जुल्मो सितम
 हंस हंस के उठाना पड़ता है
 दम इश्क़ का भरने वालो को
 घरबार लुटाना पड़ता है


 ये इश्क़ ए दिल खेल नहीं
 इसमें तो यही सब होता है
 एक बार अगर वो रूठे तो
 सौ बार मानना पड़ता है
 दम इश्क़ का भरने वालो को
 घरबार लुटाना पड़ता है