Saturday, July 4, 2026
श्री भैरव चालीसा
दोहा
श्री गणपति गुरु गौरि पद
प्रेम सहित धरि माथ ।
चालीसा वन्दन करौं
श्री शिव भैरवनाथ ॥
श्री भैरव संकट हरण
मंगल करण कृपाल ।
श्याम वरण विकराल वपु
लोचन लाल विशाल ॥
जय जय श्री काली के लाला ।
जयति जयति काशी-कुतवाला ॥
जयति बटुक-भैरव भय हारी ।
जयति काल-भैरव बलकारी ॥
जयति नाथ-भैरव विख्याता ।
जयति सर्व-भैरव सुखदाता ॥
भैरव रूप कियो शिव धारण ।
भव के भार उतारण कारण ॥
भैरव रव सुनि ह्वै भय दूरी ।
सब विधि होय कामना पूरी ॥
शेष महेश आदि गुण गायो ।
काशी-कोतवाल कहलायो ॥
जटा जूट शिर चंद्र विराजत ।
बाला मुकुट बिजायठ साजत ॥
कटि करधनी घूँघरू बाजत ।
दर्शन करत सकल भय भाजत ॥
जीवन दान दास को दीन्ह्यो ।
कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो ॥
वसि रसना बनि सारद-काली ।
दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली ॥
धन्य धन्य भैरव भय भंजन ।
जय मनरंजन खल दल भंजन ॥
कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा ।
कृपा कटाक्श सुयश नहिं थोडा ॥
जो भैरव निर्भय गुण गावत ।
अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत ॥
रूप विशाल कठिन दुख मोचन ।
क्रोध कराल लाल दुहुँ लोचन ॥
अगणित भूत प्रेत संग डोलत ।
बं बं बं शिव बं बं बोलत ॥
रुद्रकाय काली के लाला ।
महा कालहू के हो काला ॥
बटुक नाथ हो काल गँभीरा ।
श्वेत रक्त अरु श्याम शरीरा ॥
करत नीनहूँ रूप प्रकाशा ।
भरत सुभक्तन कहँ शुभ आशा ॥
रत्न जड़ित कंचन सिंहासन ।
व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ॥
तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं ।
विश्वनाथ कहँ दर्शन पावहिं ॥
जय प्रभु संहारक सुनन्द जय ।
जय उन्नत हर उमा नन्द जय ॥
भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय ।
वैजनाथ श्री जगतनाथ जय ॥
महा भीम भीषण शरीर जय ।
रुद्र त्रयम्बक धीर वीर जय ॥
अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय ।
स्वानारुढ़ सयचंद्र नाथ जय ॥
निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय ।
गहत अनाथन नाथ हाथ जय ॥
त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय ।
क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ॥
श्री वामन नकुलेश चण्ड जय ।
कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ॥
रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर ।
चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ॥
करि मद पान शम्भु गुणगावत ।
चौंसठ योगिन संग नचावत ॥
करत कृपा जन पर बहु ढंगा ।
काशी कोतवाल अड़बंगा ॥
देयँ काल भैरव जब सोटा ।
नसै पाप मोटा से मोटा ॥
जनकर निर्मल होय शरीरा ।
मिटै सकल संकट भव पीरा ॥
श्री भैरव भूतोंके राजा ।
बाधा हरत करत शुभ काजा ॥
ऐलादी के दुःख निवारयो ।
सदा कृपाकरि काज सम्हारयो ॥
सुन्दर दास सहित अनुरागा ।
श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ॥
श्री भैरव जी की जय लेख्यो ।
सकल कामना पूरण देख्यो ॥
दोहा
जय जय जय भैरव बटुक
स्वामी संकट टार ।
कृपा दास पर कीजिए
शंकर के अवतार ॥
श्री दुर्गा चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अम्बे दुखहरनी ।।
निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूँ लोक फैली उजियारी ।।
शशि लिलाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।।
रुप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुखपावे ।।
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ।।
अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।।
प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ।।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ।।
रुप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुवद्धि ऋषि मुनिन उबारा ।।
धरा रुप नरसिंह को अम्बा ।
परगट भई फाड़ कर खम्बा ।।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो ।
हिरणाकुश को स्वर्गं पठायो ।
लक्ष्मी रुप घरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ।।
क्षीरसिंधु में करत विलासा ।
दयासिंधु दीजै मन आसा ।।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ।।
मातंगी धूमावती माता ।
भुवनेश्वरि बगला सुख दाता ।।
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ।।
केहरि वाहन सोह भवानी।
लंगुर बीर चलत अगवानी ।।
कर में खप्पर खड़ग विराजै ।
जाको देख काल डर भाजै ।
सोह्रै अस्त्र और त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ।।
नगरकोट में तुम्हीं बिराजत ।
तिहूँ लोक में डंका बाजत ।।
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्त बीज शंखन संहारे ।।
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ।।
रुप कराल काली को धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ।।
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब
भई सहाय मातु तुम तब तब ||
अमर पुरी औरौं सब लोका ।
तब महिमा सब रहे अशोका ।।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नरनारी ॥
प्रेम भक्ति से जो जस गावे ।
दुःख दारिद्र निकट नहीं आवे ।।
घ्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
जन्म मरण ताको छुटि जाई ।।
जोगी सुर-मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ||
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम औ क्रोध जीति सब लीनो ||
निशिदिन ध्यान घरो शंकर को ।
काहु काल नहि सुमिरो तुमको ।।
शक्ति रुप को मरम न पायो ।
शक्ति गई तब मन पछितायो ।।
शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदंब भवानी ।।
भई प्रसन्न आदि जगदंबा ।
दई शक्ति नहीं कीन विलंबा ।।
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो ।।
आशा तृष्णा निपट सतावे ।
मोह मदादिक सब विनशावें ।।
शत्रु नाश कीजे महारानी ।
सुमिरौ इकचित तुम्हें भवानी ॥
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि सिद्धि दे करहु निहाला ॥
जब लगि जियाँ दयाफल पाँऊ ।
तुम्हरो जस मैं सदा सुनाऊँ ।।
दुर्गा चालीसा जो कोई गावें ।
सब सुख भोग परम पद पावें ।।
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदंबा भवानी ॥
हनुमान चालीसा
श्रीगुरु चरन सरोज रज
निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु
जो दायकु फल चारि ॥
बुद्धिहीन तनु जानिके
सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं
हरहु कलेस बिकार ॥
॥चौपाई॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥
राम दूत अतुलित बल धामा ।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥
महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥
कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥
सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥
लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥
रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥
सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥
तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥
जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥
दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥
राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥
सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥
आपन तेज सह्मारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥
नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥
सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥
सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥
और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥
चारों जुग परताप तुह्मारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥
साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥
राम रसायन तुह्मरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥
तुह्मरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥
अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥
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और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥
॥दोहा॥
पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥
श्री शनि चालीसा
दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुख दूर करि कीजै नाथ निहाल ॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय राखहु जनकी लाज ॥
जयति जयति शनिदेव दयाला ।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
चारि भुजा तनु श्याम विराजै ।
माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥
परम विशाल मनोहर भाला ।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके ।
हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा ।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन ।
यम कोणस्थ रौद्र दुख भंजन ॥
सौरी मन्द शनी दश नामा ।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥
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जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं ।
रंकहुँ राव करैं क्शण माहीं ॥
पर्वतहू तृण होइ निहारत ।
तृणहू को पर्वत करि डारत ॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो ।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥
बनहूँ में मृग कपट दिखाई ।
मातु जानकी गई चुराई ॥
लषणहिं शक्ति विकल करिडारा ।
मचिगा दल में हाहाकारा ॥
रावण की गति-मति बौराई ।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥
दियो कीट करि कंचन लंका ।
बजि बजरंग बीर की डंका ॥
नृप विक्रम पर तुहिं पगु धारा ।
चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥
हार नौंलखा लाग्यो चोरी ।
हाथ पैर डरवायो तोरी ॥
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भारी दशा निकृष्ट दिखायो ।
तेलहिं घर कोल्हू चलवायो ॥
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों ।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥
हरिश्चंद्र नृप नारि बिकानी ।
आपहुं भरें डोम घर पानी ॥
तैसे नल पर दशा सिरानी ।
भूंजी-मीन कूद गई पानी ॥
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई ।
पारवती को सती कराई ॥
तनिक वोलोकत ही करि रीसा ।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी ।
बची द्रौपदी होति उघारी ॥
कौरव के भी गति मति मारयो ।
युद्ध महाभारत करि डारयो ॥
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला ।
लेकर कूदि परयो पाताला ॥
शेष देव-लखि विनति लाई ।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना ।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी ।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥
गज वाहन लक्श्मी गृह आवैं ।
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं ॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा ।
सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै ।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी ।
चोरी आदि होय डर भारी ॥
तैसहि चारी चरण यह नामा ।
स्वर्ण लौह चाँदि अरु तामा ॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं ।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥
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समता ताम्र रजत शुभकारी ।
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी ॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै ।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥
अद्भूत नाथ दिखावैं लीला ।
करैं शत्रु के नशिब बलि ढीला ॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई ।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत ।
दीप दान दै बहु सुख पावत ॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा ।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥
Tuesday, June 9, 2026
जय लक्ष्मीरमणा श्री जय लक्ष्मीरमणा।
सत्यनारायण स्वामी जनपातक हरणा॥
जय लक्ष्मीरमणा।
रत्नजड़ित सिंहासन अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निराजन घंटा ध्वनि बाजे॥
जय लक्ष्मीरमणा।
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प्रगट भये कलि कारण द्विज को दर्श दियो।
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर कंचन महल कियो॥
जय लक्ष्मीरमणा।
दुर्बल भील कठारो इन पर कृपा करी।
चन्द्रचूड़ एक राजा जिनकी विपति हरी॥
जय लक्ष्मीरमणा।
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वैश्य मनोरथ पायो श्रद्धा तज दीनी।
सो फल भोग्यो प्रभुजी फिर स्तुति कीनी॥
जय लक्ष्मीरमणा।
भाव भक्ति के कारण छिन-छिन रूप धर्यो।
श्रद्धा धारण कीनी तिनको काज सर्यो॥
जय लक्ष्मीरमणा।
आरती कुंजबिहारी की
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की
गले में बैजंती माला,
बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली,
राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै;
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
ॐ जय शिव ओंकारा हर शिव ओंकारा
ब्रम्हा विष्णु सदाशिवअर्ध्नागी धारा
ॐ जय शिव ओंकारा.
एकानन चतुरानन पंचांनन राजे
हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे
ॐ जय शिव ओंकारा
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दो भुज चार चतुर्भज दस भुजअति सोहें
तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहें
ॐ जय शिव ओंकारा…
अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड़मालाधारी
चंदन, मृदमग सोहें, भाले शशिधारी
ॐ जय शिव ओंकारा.
श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें
सनकादिक,ब्रम्हादिक,भूतादिक संगें
ॐ जय शिव ओंकारा…
कर के मध्य कमड़ंल चक्र त्रिशूल धरता
जगकर्ता, जगभर्ता, जगसंहारकर्ता
ॐ जय शिव ओंकारा.
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका
प्रवणाक्षर के मध्यें ये तीनों एका
ॐ जय शिव ओंकारा.
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें
ॐ जय शिव ओंकारा.
बजरंग बाण
दोहा -
निश्चय प्रेम प्रतीति ते,
बिनय करैं सनमान ।
तेहि के कारज सकल शुभ,
सिद्ध करैं हनुमान ॥
चौपाई -
जय हनुमंत संत हितकारी ।
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥
जन के काज बिलंब न कीजै ।
आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा ।
सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ॥
आगे जाय लंकिनी रोका ।
मारेहु लात गई सुरलोका ॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा ।
सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा ।
अति आतुर जमकातर तोरा ॥
अक्षय कुमार मारि संहारा ।
लूम लपेटि लंक को जारा ॥
लाह समान लंक जरि गई ।
जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी ।
कृपा करहु उर अंतरयामी ॥
जय जय लखन प्रान के दाता ।
आतुर ह्वै दुख करहु निपाता ॥
जै हनुमान जयति बलसागर ।
सुर समूह समरथ भटनागर ॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले ।
बैरिहि मारू बज्र की कीले ॥
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो ।
महाराज प्रभु दास उबारो ॥
ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो ।
बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो ॥
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीशा ।
ॐ हुं हुं हुं हनु अरिउरसीशा ॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै ।
राम दूत धरू मारू धाइ कै ॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा ।
दुख पावत जन केहि अपराधा ॥
पूजा जप तप नेम अचारा ।
नहिं जानत हौं दास तुम्हारा ॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं ।
तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं ॥
जय अंजनि कुमार बलवन्ता ।
शंकरसुवन बीर हनुमन्ता ॥
बदन कराल काल-कुल-घालक ।
राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर ।
अगिन बेताल काल मारी मर ॥
इन्हें मारू, तोहि सपथ राम की ।
राखउ नाथ मरजाद नाम की ॥
जनकसुता हरि दास कहावौ ।
ताकी सपथ बिलंब न लावौ ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा ।
सुमिरत होय दुसह दुख नासा ॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं ।
यहि औसर अब केहि गोहरावौं ॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई ।
पायँ परौं, कर जोरि मनाई ॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता ।
ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल ।
ॐ सं सं सहमि पराने खलदल ॥
अपने जन को तुरत उबारौ ।
सुमिरत होय आनंद हमारौ ॥
ताते विनती करौं पुकारी ।
हरहु सकल दुःख विपति हमारी ॥
ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा ।
कस न हरहु दुःख संकट मोरा ॥
हे बजरंग, बाण सम धावौ ।
मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ ॥
हे कपिराज काज कब ऐहौ ।
अवसर चूकि अन्त पछतैहौ ॥
जन की लाज जात ऐहि बारा ।
धावहु हे कपि पवन कुमारा ॥
जयति जयति जै जै हनुमाना ।
जयति जयति गुण ज्ञान निधाना ॥
जयति जयति जै जै कपिराई ।
जयति जयति जै जै सुखदाई ॥
जयति जयति जै राम पियारे ।
जयति जयति जै सिया दुलारे ॥
जयति जयति मुद मंगलदाता ।
जयति जयति त्रिभुवन विख्याता ॥
ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा ।
पावत पार नहीं लवलेषा ॥
राम रूप सर्वत्र समाना ।
देखत रहत सदा हर्षाना ॥
विधि शारदा सहित दिनराती ।
गावत कपि के गुन बहु भांति ॥
तुम सम नहीं जगत बलवाना ।
करि विचार देखौं विधि नाना ॥
यह जिय जानि शरण तब आई ।
ताते विनय करौं चित लाई ॥
सुनि कपि आरत वचन हमारे ।
मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे ॥
एहि प्रकार विनती कपि केरी ।
जो जन करैं लहै सुख ढेरी ॥
याके पढ़त वीर हनुमाना ।
धावत बाण तुल्य बनवाना ॥
मेटत आए दुःख क्षण माहिं ।
दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं ॥
पाठ करै बजरंग बाण की ।
हनुमत रक्षा करै प्राण की ॥
डीठ, मूठ, टोनादिक नासै ।
परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे ॥
भैरवादि सुर करै मिताई ।
आयुस मानि करै सेवकाई ॥
प्रण कर पाठ करें मन लाई ।
अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई ॥
आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै ।
ताकी छांह काल नहिं चापै ॥
दै गूगुल की धूप हमेशा ।
करै पाठ तन मिटै कलेषा ॥
यह बजरंग बाण जेहि मारे ।
ताहि कहौ फिर कौन उबारे ॥
शत्रु समूह मिटै सब आपै ।
देखत ताहि सुरासुर कांपै ॥
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई ।
रहै सदा कपिराज सहाई ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै ।
ताहि कहौ फिरि कवन उबारै ॥
पाठ करै बजरंग-बाण की ।
हनुमत रक्षा करै प्रान की ॥
यह बजरंग बाण जो जापैं ।
तासों भूत-प्रेत सब कापंऐ ॥
धूप देय जो जपै हमेसा ।
ताके तन नहिं रहै कलेसा ॥
दोहाः - उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै,
पाठ करै धरि ध्यान ।
बाधा सब हर, करैं
सब काम सफल हनुमान ॥
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै
सदा धरैं उर ध्यान ।
तेहि के कारज सकल शुभ
सिद्ध करैं हनुमान
इति श्रीगोसाईतुलसीदासजीकृत
श्रीहनुमंतबजरंगबाण समाप्त ।
संकटमोचन हनुमानाष्टक
बाल समय रबि भक्षि लियो तब
तीनहुँ लोक भयो अँधियारो ।
ताहि सों त्रास भयो जग को यह
संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब
छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो ।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महा मुनि साप दियो तब
चाहिय कौन बिचार बिचारो ।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु
सो तुम दास के सोक निवारो ।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ २ ॥
अंगद के सँग लेन गये सिय
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु
बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो ।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब
लाय सिया सुधि प्रान उबारो ।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ३ ॥
रावन त्रास दई सिय को सब
राक्षसि सों कहि सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु
जाय महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु
दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ४ ॥
बान लग्यो उर लछिमन के तब
प्रान तजे सुत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै
गिरि द्रोन सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दई तब
लछिमन के तुम प्रान उबारो ।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ५ ॥
रावन जुद्ध अजान कियो तब
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल
मोह भयो यह संकट भारो ।
आनि खगेस तबै हनुमान जु
बंधन काटि सुत्रास निवारो ।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ६ ॥
बंधु समेत जबै अहिरावन
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि
देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो ।
जाय सहाय भयो तब ही
अहिरावन सैन्य समेत सँहारो ।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ७ ॥
काज किये बड़ देवन के तुम
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को
जो तुमसों नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु
जो कछु संकट होय हमारो ।
को नहिं जानत है जगमें कपि
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ८ ॥
दोहा
लाल देह लाली लसे अरू धरि लाल लँगूर ।
बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि सूर ॥
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॥ इति गोस्वामि तुलसीदास कृत
संकटमोचन हनुमानाष्टक सम्पूर्ण ॥
नवग्रहपीडाहरस्तोत्रम्
ग्रहाणामादिरादित्यो लोकरक्षणकारकः ।
विषमस्थानसंभूतां पीडां हरतु मे रविः ॥ १॥
रोहिणीशः सुधामूर्तिः सुधागात्रः सुधाशनः ।
विषमस्थानसंभूतां पीडां हरतु मे विधुः ॥ २॥
भूमिपुत्रो महातेजा जगतां भयकृत् सदा ।
वृष्टिकृद्वृष्टिहर्ता च पीडां हरतु मे कुजः ॥ ३॥
उत्पातरूपो जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युतिः ।
सूर्यप्रियकरो विद्वान् पीडां हरतु मे बुधः ॥ ४॥
देवमन्त्री विशालाक्षः सदा लोकहिते रतः ।
अनेकशिष्यसम्पूर्णः पीडां हरतु मे गुरुः ॥ ५॥
दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामतिः ।
प्रभुस्ताराग्रहाणां च पीडां हरतु मे भृगुः ॥ ६॥
सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो विशालाक्षः शिवप्रियः ।
मन्दचारः प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनिः ॥ ७॥
महाशिरा महावक्त्रो दीर्घदंष्ट्रो महाबलः ।
अतनुश्चोर्ध्वकेशश्च पीडां हरतु मे तमः ॥ ८॥
अनेकरूपवर्णैश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
उत्पातरूपो जगतां पीडां हरतु मे शिखी ॥ ९॥
॥ इति नवग्रहपीडाहरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
केतुस्तोत्रम्
अथ केतुस्तोत्रप्रारम्भः ।
ॐ अस्य श्रीकेतुस्तोत्रमहामन्त्रस्य
वामदेव ॠषिः ।
अनुष्टुप्छन्दः ।
केतुर्देवता ।
केतुप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
गौतम उवाच ।
मुनीन्द्र सूत तत्त्वज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
सर्वरोगहरं ब्रूहि केतोः स्तोत्रमनुत्तमम् ॥ १॥
सूत उवाच ।
शृणु गौतम वक्ष्यामि स्तोत्रमेतदनुत्तमम् ।
गुह्याद्गुह्यतमं केतोः ब्रह्मणा कीर्तितं पुरा ॥ २॥
आद्यः करालवदनो द्वितीयो रक्तलोचनः ।
तृतीयः पिङ्गलाक्षश्च चतुर्थो ज्ञानदायकः ॥ ३॥
पञ्चमः कपिलाक्षश्च षष्ठः कालाग्निसन्निभः ।
सप्तमो हिमगर्भश्च धूम्रवर्णोष्टमस्तथा ॥ ४॥
नवमः कृत्तकण्ठश्च दशमः नरपीठगः ।
एकादशस्तु श्रीकण्ठः द्वादशस्तु गदायुधः ॥ ५॥
द्वादशैते महाक्रूराः सर्वोपद्रवकारकाः ।
पर्वकाले पीडयन्ति दिवाकरनिशाकरौ ॥ ६॥
नामद्वादशकं स्तोत्रं केतोरेतन्महात्मनः ।
पठन्ति येऽन्वहं भक्त्या तेभ्यः केतुः प्रसीदति ॥ ७॥
कुलुक्थधान्ये विलिखेत् षट्कोणं मण्डलं शुभम् ।
पद्ममष्टदलं तत्र विलिखेच्च विधानतः ॥ ८॥
नीलं घटं च संस्थाप्य दिवाकरनिशाकरौ ।
केतुं च तत्र निक्षिप्य पूजयित्वा विधानतः ॥ ९॥
स्तोत्रमेतत्पठित्वा च ध्यायन् केतुं वरप्रदम् ।
ब्राह्मणं श्रोत्रियं शान्तं पूजयित्वा कुटुम्बिनम् ॥ १०॥
केतोः करालवक्त्रस्य प्रतिमां वस्त्रसंयुताम् ।
कुम्भादिभिश्च संयुक्तां चित्रातारे प्रदापयेत् ॥ ११॥
दानेनानेन सुप्रीतः केतुः स्यात्तस्य सौख्यदः ।
वत्सरं प्रयता भूत्वा पूजयित्वा विधानतः ॥ १२॥
मूलमष्टोत्तरशतं ये जपन्ति नरोत्तमाः ।
तेषां केतुप्रसादेन न कदाचिद्भयं भवेत् ॥ १३॥
इति केतुस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
आदित्यस्तोत्रम्
श्रीगणेशाय नमः ।
नवग्रहाणां सर्वेषां सूर्यादीनां पृथक् पृथक् ।
पीडा च दुःसहा राजञ्जायते सततं नृणाम् ॥ १॥
पीडानाशाय राजेन्द्र नामानि शृणु भास्वतः ।
सूर्यादीनां च सर्वेषां पीडा नश्यति शृण्वतः ॥ २॥
आदित्य सविता सूर्यः पूषार्कः शीघ्रगो रविः ।
भगस्त्वष्टाऽर्यमा हंसो हेलिस्तेजो निधिर्हरिः ॥ ३॥
दिननाथो दिनकरः सप्तसप्तिः प्रभाकरः ।
विभावसुर्वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः ॥ ४॥
हरिदश्वः कालवक्त्रः कर्मसाक्षी जगत्पतिः ।
पद्मिनीबोधको भानुर्भास्करः करुणाकरः ॥ ५॥
द्वादशात्मा विश्वकर्मा लोहिताङ्गस्तमोनुदः ।
जगन्नाथोऽरविन्दाक्षः कालात्मा कश्यपात्मजः ॥ ६॥
भूताश्रयो ग्रहपतिः सर्वलोकनमस्कृतः ।
सङ्काशो भास्वानदितिनन्दनः ॥ ७॥
ध्वान्तेभसिंहः सर्वात्मा लोकनेत्रो विकर्तनः ।
मार्तण्डो मिहिरः सूरस्तपनो लोकतापनः ॥ ८॥
जगत्कर्ता जगत्साक्षी शनैश्चरपिता जयः ।
सहस्ररश्मिस्तरणिर्भगवान्भक्तवत्सलः ॥ ९॥
विवस्वानादिदेवश्च देवदेवो दिवाकरः ।
धन्वन्तरिर्व्याधिहर्ता दद्रुकुष्ठविनाशनः ॥ १०॥
चराचरात्मा मैत्रेयोऽमितो विष्णुर्विकर्तनः ।
कोकशोकापहर्ता च कमलाकर आत्मभूः ॥ ११॥
नारायणो महादेवो रुद्रः पुरुष ईश्वरः ।
जीवात्मा परमात्मा च सूक्ष्मात्मा सर्वतोमुखः ॥ १२॥
इन्द्रोऽनलो यमश्चैव नैरृतो वरुणोऽनिलः ।
श्रीद ईशान इन्दुश्च भौमः सौम्यो गुरुः कविः ॥ १३॥
शौरिर्विधुन्तुदः केतुः कालः कालात्मको विभुः ।
सर्वदेवमयो देवः कृष्णः कायप्रदायकः ॥ १४॥
य एतैर्नामभिर्मर्त्यो भक्त्या स्तौति दिवाकरम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वरोगविवर्जितः ॥ १५॥
पुत्रवान् धनवान् श्रीमाञ्जायते स न संशयः ।
रविवारे पठेद्यस्तु नामान्येतानि भास्वतः ॥ १६॥
पीडाशान्तिर्भवेत्तस्य ग्रहाणां च विशेषतः ।
सद्यः सुखमवाप्नोति चायुर्दीर्घं च नीरुजम् ॥ १७॥
इति श्रीभविष्यपुराणे आदित्यस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।