←Back

Tuesday, June 9, 2026

श्री दुर्गा चालीसा

 नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
 नमो नमो अम्बे दुखहरनी ।।
 निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
 तिहूँ लोक फैली उजियारी ।।
 शशि लिलाट मुख महाविशाला ।
 नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।।
 रुप मातु को अधिक सुहावे ।
 दरश करत जन अति सुखपावे ।।


 तुम संसार शक्ति लय कीना ।
 पालन हेतु अन्न धन दीना ।।
 अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।
 तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।।
 प्रलयकाल सब नाशन हारी।
 तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ।।
 शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
 ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ।।

 रुप सरस्वती को तुम धारा ।
 दे सुवद्धि ऋषि मुनिन उबारा ।।
 धरा रुप नरसिंह को अम्बा ।
 परगट भई फाड़ कर खम्बा ।।
 रक्षा करि प्रहलाद बचायो ।
 हिरणाकुश को स्वर्गं पठायो ।
 लक्ष्मी रुप घरो जग माहीं ।
 श्री नारायण अंग समाहीं ।।


 क्षीरसिंधु में करत विलासा ।
 दयासिंधु दीजै मन आसा ।।
 हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
 महिमा अमित न जात बखानी ।।
 मातंगी धूमावती माता ।
 भुवनेश्वरि बगला सुख दाता ।।
 श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
 छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ।।

 केहरि वाहन सोह भवानी।
 लंगुर बीर चलत अगवानी ।।
 कर में खप्पर खड़ग विराजै ।
 जाको देख काल डर भाजै ।
 सोह्रै अस्त्र और त्रिशूला ।
 जाते उठत शत्रु हिय शूला ।।
 नगरकोट में तुम्हीं बिराजत ।
 तिहूँ लोक में डंका बाजत ।।


 शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
 रक्त बीज शंखन संहारे ।।
 महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
 जेहि अघ भार मही अकुलानी ।।
 रुप कराल काली को धारा ।
 सेन सहित तुम तिहि संहारा ।।
 परी गाढ़ सन्तन पर जब जब
 भई सहाय मातु तुम तब तब ||

 अमर पुरी औरौं सब लोका ।
 तब महिमा सब रहे अशोका ।।
 ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
 तुम्हें सदा पूजें नरनारी ॥
 प्रेम भक्ति से जो जस गावे ।
 दुःख दारिद्र निकट नहीं आवे ।।
 घ्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
 जन्म मरण ताको छुटि जाई ।।


 जोगी सुर-मुनि कहत पुकारी ।
 योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ||
 शंकर आचारज तप कीनो ।
 काम औ क्रोध जीति सब लीनो ||
 निशिदिन ध्यान घरो शंकर को ।
 काहु काल नहि सुमिरो तुमको ।।
 शक्ति रुप को मरम न पायो ।
 शक्ति गई तब मन पछितायो ।।

 शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।
 जय जय जय जगदंब भवानी ।।
 भई प्रसन्न आदि जगदंबा ।
 दई शक्ति नहीं कीन विलंबा ।।
 मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
 तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो ।।
 आशा तृष्णा निपट सतावे ।
 मोह मदादिक सब विनशावें ।।


 शत्रु नाश कीजे महारानी ।
 सुमिरौ इकचित तुम्हें भवानी ॥
 करो कृपा हे मातु दयाला ।
 ऋद्धि सिद्धि दे करहु निहाला ॥
 जब लगि जियाँ दयाफल पाँऊ ।
 तुम्हरो जस मैं सदा सुनाऊँ ।।
 दुर्गा चालीसा जो कोई गावें ।
 सब सुख भोग परम पद पावें ।।

 देवीदास शरण निज जानी ।
 करहु कृपा जगदंबा भवानी ॥