Tuesday, June 9, 2026

हनुमान चालीसा


श्रीगुरु चरन सरोज रज

निज मनु मुकुरु सुधारि ।
 बरनउँ रघुबर बिमल जसु

 जो दायकु फल चारि ॥

 बुद्धिहीन तनु जानिके

 सुमिरौं पवन-कुमार ।
 बल बुधि बिद्या देहु मोहिं

 हरहु कलेस बिकार ॥

 ॥चौपाई॥

 जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।

 जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥

 राम दूत अतुलित बल धामा ।
 अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

 महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
 कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥

 कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
 कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥

 हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
 काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥

 सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
 तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥

 बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
 राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

 प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
 राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥


 सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
 बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥

 भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
 रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥

 लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
 श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

 रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
 तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

 सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
 अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥

 सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
 नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥

 जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
 कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥

 तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
 राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

 तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
 लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

 जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
 लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

 प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
 जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

 दुर्गम काज जगत के जेते ।
 सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥

 राम दुआरे तुम रखवारे ।
 होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

 सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
 तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

 आपन तेज सह्मारो आपै ।
 तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥

 भूत पिसाच निकट नहिं आवै 
 महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥


 नासै रोग हरै सब पीरा ।
 जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥

 सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
 मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥

 सब पर राम तपस्वी राजा ।
 तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

 और मनोरथ जो कोई लावै ।
 सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

 चारों जुग परताप तुह्मारा ।
 है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

 साधु सन्त के तुम रखवारे ।
 असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥

 अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
 अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥

 राम रसायन तुह्मरे पासा ।
 सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

 तुह्मरे भजन राम को पावै ।
 जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

 अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
 जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥
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 और देवता चित्त न धरई ।
 हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

 सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
 जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

 जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
 कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

 जो सत बार पाठ कर कोई ।
 छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥

 जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
 होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

 तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
 कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥


 ॥दोहा॥
 पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
 राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप