Tuesday, June 9, 2026

श्री शनि चालीसा

 दोहा
 जय गणेश गिरिजा सुवन मंगल करण कृपाल ।
 दीनन के दुख दूर करि कीजै नाथ निहाल ॥
 जय जय श्री शनिदेव प्रभु सुनहु विनय महाराज ।
 करहु कृपा हे रवि तनय राखहु जनकी लाज ॥

जयति जयति शनिदेव दयाला ।
 करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥

 चारि भुजा तनु श्याम विराजै ।
 माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥

 परम विशाल मनोहर भाला ।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥

 कुण्डल श्रवण चमाचम चमके ।
हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥

 कर में गदा त्रिशूल कुठारा ।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥

 पिंगल कृष्णो छाया नन्दन ।
यम कोणस्थ रौद्र दुख भंजन ॥


 सौरी मन्द शनी दश नामा ।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥
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 जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं ।
 रंकहुँ राव करैं क्शण माहीं ॥

 पर्वतहू तृण होइ निहारत ।
तृणहू को पर्वत करि डारत ॥

 राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो ।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥


 बनहूँ में मृग कपट दिखाई ।
मातु जानकी गई चुराई ॥

 लषणहिं शक्ति विकल करिडारा ।
 मचिगा दल में हाहाकारा ॥

 रावण की गति-मति बौराई ।
 रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥

 दियो कीट करि कंचन लंका ।
 बजि बजरंग बीर की डंका ॥


 नृप विक्रम पर तुहिं पगु धारा ।
चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥

हार नौंलखा लाग्यो चोरी ।
 हाथ पैर डरवायो तोरी ॥
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 भारी दशा निकृष्ट दिखायो ।
तेलहिं घर कोल्हू चलवायो ॥

 विनय राग दीपक महँ कीन्हयों ।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥


 हरिश्चंद्र नृप नारि बिकानी ।
आपहुं भरें डोम घर पानी ॥

 तैसे नल पर दशा सिरानी ।
 भूंजी-मीन कूद गई पानी ॥

 श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई ।
 पारवती को सती कराई ॥

 तनिक वोलोकत ही करि रीसा ।
 नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥

 पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी ।
बची द्रौपदी होति उघारी ॥

 कौरव के भी गति मति मारयो ।
 युद्ध महाभारत करि डारयो ॥

 रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला ।
 लेकर कूदि परयो पाताला ॥

 शेष देव-लखि विनति लाई ।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥

 वाहन प्रभु के सात सुजाना ।
 जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥

 जम्बुक सिंह आदि नख धारी ।
 सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥

 गज वाहन लक्श्मी गृह आवैं ।
 हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं ॥

 गर्दभ हानि करै बहु काजा ।
 सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥


 जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै ।
 मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥

 जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी ।
 चोरी आदि होय डर भारी ॥

 तैसहि चारी चरण यह नामा ।
 स्वर्ण लौह चाँदि अरु तामा ॥

 लौह चरण पर जब प्रभु आवैं ।
 धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥

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 समता ताम्र रजत शुभकारी ।
 स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी ॥

 जो यह शनि चरित्र नित गावै ।
 कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥

 अद्भूत नाथ दिखावैं लीला ।
 करैं शत्रु के नशिब बलि ढीला ॥

 जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई ।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥


 पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत ।
 दीप दान दै बहु सुख पावत ॥

 कहत राम सुन्दर प्रभु दासा ।
 शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥