Tuesday, June 9, 2026

 बजरंग बाण

 दोहा -
 निश्चय प्रेम प्रतीति ते,
 बिनय करैं सनमान ।

तेहि के कारज सकल शुभ,
 सिद्ध करैं हनुमान ॥

 चौपाई -
 जय हनुमंत संत हितकारी ।
 सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥

 जन के काज बिलंब न कीजै ।
 आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥

 जैसे कूदि सिंधु महिपारा ।
 सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ॥

 आगे जाय लंकिनी रोका ।
 मारेहु लात गई सुरलोका ॥


 जाय बिभीषन को सुख दीन्हा ।
 सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥

 बाग उजारि सिंधु महँ बोरा ।
 अति आतुर जमकातर तोरा ॥

 अक्षय कुमार मारि संहारा ।
 लूम लपेटि लंक को जारा ॥

 लाह समान लंक जरि गई ।
 जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥


 अब बिलंब केहि कारन स्वामी ।
 कृपा करहु उर अंतरयामी ॥

 जय जय लखन प्रान के दाता ।
 आतुर ह्वै दुख करहु निपाता ॥

 जै हनुमान जयति बलसागर ।
 सुर समूह समरथ भटनागर ॥

 ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले ।
 बैरिहि मारू बज्र की कीले ॥


 गदा बज्र लै बैरिहिं मारो ।
 महाराज प्रभु दास उबारो ॥

 ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो ।
 बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो ॥

 ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीशा ।
 ॐ हुं हुं हुं हनु अरिउरसीशा ॥

 सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै ।
 राम दूत धरू मारू धाइ कै ॥

 जय जय जय हनुमंत अगाधा ।
 दुख पावत जन केहि अपराधा ॥

 पूजा जप तप नेम अचारा ।
 नहिं जानत हौं दास तुम्हारा ॥

 बन उपबन मग गिरि गृह माहीं ।
 तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं ॥

 जय अंजनि कुमार बलवन्ता ।
 शंकरसुवन बीर हनुमन्ता ॥


 बदन कराल काल-कुल-घालक ।
 राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥

 भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर ।
 अगिन बेताल काल मारी मर ॥

 इन्हें मारू, तोहि सपथ राम की ।
 राखउ नाथ मरजाद नाम की ॥

 जनकसुता हरि दास कहावौ ।
 ताकी सपथ बिलंब न लावौ ॥


 जै जै जै धुनि होत अकासा ।
 सुमिरत होय दुसह दुख नासा ॥

 चरन पकरि, कर जोरि मनावौं ।
 यहि औसर अब केहि गोहरावौं ॥

 उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई ।
 पायँ परौं, कर जोरि मनाई ॥

 ॐ चं चं चं चं चपल चलंता ।
 ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥

 ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल ।
 ॐ सं सं सहमि पराने खलदल ॥

 अपने जन को तुरत उबारौ ।
 सुमिरत होय आनंद हमारौ ॥

 ताते विनती करौं पुकारी ।
 हरहु सकल दुःख विपति हमारी ॥

 ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा ।
 कस न हरहु दुःख संकट मोरा ॥

 हे बजरंग, बाण सम धावौ ।
 मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ ॥

 हे कपिराज काज कब ऐहौ ।
 अवसर चूकि अन्त पछतैहौ ॥

 जन की लाज जात ऐहि बारा ।
 धावहु हे कपि पवन कुमारा ॥

 जयति जयति जै जै हनुमाना ।
 जयति जयति गुण ज्ञान निधाना ॥


 जयति जयति जै जै कपिराई ।
 जयति जयति जै जै सुखदाई ॥

 जयति जयति जै राम पियारे ।
 जयति जयति जै सिया दुलारे ॥

 जयति जयति मुद मंगलदाता ।
 जयति जयति त्रिभुवन विख्याता ॥

 ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा ।
 पावत पार नहीं लवलेषा ॥


 राम रूप सर्वत्र समाना ।
 देखत रहत सदा हर्षाना ॥

 विधि शारदा सहित दिनराती ।
 गावत कपि के गुन बहु भांति ॥

 तुम सम नहीं जगत बलवाना ।
 करि विचार देखौं विधि नाना ॥

 यह जिय जानि शरण तब आई ।
 ताते विनय करौं चित लाई ॥


 सुनि कपि आरत वचन हमारे ।
 मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे ॥

 एहि प्रकार विनती कपि केरी ।
 जो जन करैं लहै सुख ढेरी ॥

 याके पढ़त वीर हनुमाना ।
 धावत बाण तुल्य बनवाना ॥

 मेटत आए दुःख क्षण माहिं ।
 दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं ॥

 पाठ करै बजरंग बाण की ।
 हनुमत रक्षा करै प्राण की ॥

 डीठ, मूठ, टोनादिक नासै ।
 परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे ॥

 भैरवादि सुर करै मिताई ।
 आयुस मानि करै सेवकाई ॥

 प्रण कर पाठ करें मन लाई ।
 अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई ॥


 आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै ।
 ताकी छांह काल नहिं चापै ॥

 दै गूगुल की धूप हमेशा ।
 करै पाठ तन मिटै कलेषा ॥

 यह बजरंग बाण जेहि मारे ।
 ताहि कहौ फिर कौन उबारे ॥

 शत्रु समूह मिटै सब आपै ।
 देखत ताहि सुरासुर कांपै ॥


 तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई ।
 रहै सदा कपिराज सहाई ॥

 यह बजरंग-बाण जेहि मारै ।
 ताहि कहौ फिरि कवन उबारै ॥

 पाठ करै बजरंग-बाण की ।
 हनुमत रक्षा करै प्रान की ॥

 यह बजरंग बाण जो जापैं ।
 तासों भूत-प्रेत सब कापंऐ ॥


 धूप देय जो जपै हमेसा ।
 ताके तन नहिं रहै कलेसा ॥

 दोहाः - उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै,
 पाठ करै धरि ध्यान ।
 बाधा सब हर, करैं
सब काम सफल हनुमान ॥

 प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै
सदा धरैं उर ध्यान ।

 तेहि के कारज सकल शुभ
 सिद्ध करैं हनुमान 


 इति श्रीगोसाईतुलसीदासजीकृत
 श्रीहनुमंतबजरंगबाण समाप्त ।