मैं लखिया अपने आप को मुझे ओर कोई नहीं पाया।
संत परमानन्द जी की वाणी।।
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
तीरथ बरत किया बहुतेरा ,
तासे संकट मिटा नहीं मेरा ,
गुफा बावड़ी जंगल हेरा ,
मंदिर में जपिया जाप रे
वहां कोई नजर नहीं आया। 1
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
योग धारणा धारण करके ,
नेत्र बंद कर ध्यान धरके ,
देख्या छेद स्वांस को भर के ,
देखि ज्योति नभ की रे ,
हैं तत्वों की छाया। 2
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
जिव्हा बिना जाप कर लीन्हा ,
सुरत शबद स्वांशा में दीन्हा ,
तू सुने सो चेतन आप ह्वेन ,
सब तूने खेल बनाया। 3
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
अपने आप और नहीं कोई ,
परमानंद को निश्चय यो ही ,
सदगुरु पूरण पारखी सोइ ,
मेटि त्रिगुणा की तप को ,
सब खाता खतम कराया। 4
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
तीरथ बरत किया बहुतेरा ,
तासे संकट मिटा नहीं मेरा ,
गुफा बावड़ी जंगल हेरा ,
मंदिर में जपिया जाप रे
वहां कोई नजर नहीं आया। 1
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
योग धारणा धारण करके ,
नेत्र बंद कर ध्यान धरके ,
देख्या छेद स्वांस को भर के ,
देखि ज्योति नभ की रे ,
हैं तत्वों की छाया। 2
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
जिव्हा बिना जाप कर लीन्हा ,
सुरत शबद स्वांशा में दीन्हा ,
तू सुने सो चेतन आप ह्वेन ,
सब तूने खेल बनाया। 3
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।
अपने आप और नहीं कोई ,
परमानंद को निश्चय यो ही ,
सदगुरु पूरण पारखी सोइ ,
मेटि त्रिगुणा की तप को ,
सब खाता खतम कराया। 4
मैं लखिया अपने आप को
मुझे ओर कोई नहीं पाया।