Wednesday, June 3, 2026

मैं लखिया अपने आप को मुझे ओर कोई नहीं पाया। 

    

संत परमानन्द जी की वाणी।।
मैं लखिया अपने आप को
 मुझे ओर कोई नहीं पाया।

 तीरथ बरत किया बहुतेरा ,
 तासे संकट मिटा नहीं मेरा ,
गुफा बावड़ी जंगल हेरा ,
 मंदिर में जपिया जाप रे
 वहां कोई नजर नहीं आया। 1


 मैं लखिया अपने आप को
 मुझे ओर कोई नहीं पाया।


 योग धारणा धारण करके ,
नेत्र बंद कर ध्यान धरके ,
 देख्या छेद स्वांस को भर के ,
देखि ज्योति नभ की रे ,
 हैं तत्वों की छाया। 2



 मैं लखिया अपने आप को
 मुझे ओर कोई नहीं पाया।

 जिव्हा बिना जाप कर लीन्हा ,
सुरत शबद स्वांशा में दीन्हा ,
तू सुने सो चेतन आप ह्वेन ,
सब तूने खेल बनाया। 3


 मैं लखिया अपने आप को
 मुझे ओर कोई नहीं पाया।

 अपने आप और नहीं कोई ,
 परमानंद को निश्चय यो ही ,
सदगुरु पूरण पारखी सोइ ,
 मेटि त्रिगुणा की तप को ,
सब खाता खतम कराया। 4


 मैं लखिया अपने आप को
 मुझे ओर कोई नहीं पाया।