| 98797--97-79-9-768857 जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै । ता दिन तेरे तन-तरुवर के सबै पात झरि जैहैं । या देही कौ गरब न करियै, स्यार-काग-गिध खैहैं । तीननि में तन कृमि, कै विष्टा, कह्वै खाक उड़ैहै । कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा कहँ रँग-रूप दिखैहै । जिन लोगनि सौं नेह करत है, तेई देखि घिनैहैं । घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होइ धर खैहैं । जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैं । तेई लै खोपरी बाँस दै, सीस फोरि बिखरैहैं ! अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, संतनि मैं कछु पैहै । नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं, जम की मार सो खैहै । सूरदास भगवंत-भजन बिनु बृथा सु जनम गँवैहै ॥2॥ 76777454354324414535535 |
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