Monday, October 2, 2023

#जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै ।

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जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै ।
 ता दिन तेरे तन-तरुवर के
 सबै पात झरि जैहैं ।

 या देही कौ गरब न करियै,
 स्यार-काग-गिध खैहैं ।
 तीननि में तन कृमि, कै विष्टा,
 कह्वै खाक उड़ैहै ।


 कहँ वह नीर,
 कहाँ वह सोभा
 कहँ रँग-रूप दिखैहै ।
 जिन लोगनि सौं नेह करत है,
 तेई देखि घिनैहैं ।

 घर के कहत सबारे काढ़ौ,
 भूत होइ धर खैहैं ।
 जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ,
 देवी-देव मनैहैं ।


 तेई लै खोपरी बाँस दै,
 सीस फोरि बिखरैहैं !
 अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति,
 संतनि मैं कछु पैहै ।

 नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं,
 जम की मार सो खैहै ।
 सूरदास भगवंत-भजन बिनु
 बृथा सु जनम गँवैहै ॥2॥
 
   
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