| 878776843646365753 रे मन मूरख जनम गँवायौ । करि अभिमान वुषय-रस गीध्यौ, स्याम-सरन नहिं आयौ । यह संसार सुवा-सेमर ज्यौं, सुन्दर देखि लुभायौ । चाखन लाग्यौ रुई गई उड़ि हाथ कहिं आयौ । कहा होत अब के पछिताऐँ पहिलैं पाप कमायौ । कहत सूर भगवंत-भजन बिनु, सिर धुनि-धुनि पछितायौ ॥ 676576774457474774776 |
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