सद्गुरु सहज बतायो,
जब रतन हाथ में आयो ।
मन-ममता को दूर हटाई,
ज्ञान-भान दरसायो ।
अपणो रूप आप में परख्यो,
दूजो हतो मिटायो ।१
सद्गुरु सहज बतायो,
जब रतन हाथ में आयो ।
मुझमें जगत्, जगत् में मैं हूँ,
यह स्वरूप समझायो
मिथ्या भरम मान कर बैठो,
तन अभिमान गिरायो ॥ २ ॥
सद्गुरु सहज बतायो,
जब रतन हाथ में आयो ।
सत् संगत अमृत रस पायो
पीवत खूब छकायो । ।
अनन्त छक्यो जब सोय गयो फिर,
जग्यो फेर भर पायो ।।३।।
सद्गुरु सहज बतायो,
जब रतन हाथ में आयो ।
नाथ जलन्धर प्रताप भयो जद,
सन्त शरणागत आयो ।
देवनाथ गुरु मानसिंह के
भ्रम-तम दूर भगायो || ४ ||
सद्गुरु सहज बतायो,
जब रतन हाथ में आयो ।