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Friday, July 24, 2026


सूता सारंगधर जोग में रे जोगिया,

 क्यों कर सारंग जमाय ॥ टेर॥

सारँग लखे सारँग पियाँ रे जोगिया, 

रहूँ नित सारँग माँय।

मीठी रँग आ सारँगी रे जोगिया, 

मो मन घणी सुहाय ॥

पाँच प्राण पाचूँ कोश है जोगिया, 

इन्द्री दश के लार।

एक मन दूज बुद्धि बसे रे जोगिया, 

ए तार बाईस सुणाय ॥

उत्तम मध्यम कनिष्ठ है रे जोगिया,

 है तीनूँ ही ग्राम।

सातूं भोम सो सप्त सुर रे जोगिया, 

जिण पर लियो में विश्राम ॥

आवत जावत रो गज कियो रे जोगिया 

स्वासो ही स्वास चलाय।

ओहँ सोहँ री रागणी रे जोगिया, 

सुणियाँ मन स्थिर हो जाय ॥

सारंगधर सारंगी बजे रे जोगिया, 

इण सारङ्ग लियो बुलाय।

सारंग ताणने मारियो रे जोगिया, 

सारंग प्राण गमाय ॥

सारंग मर शाह रंग भई रे जोगिया, 

अब सारंग मिलियो आय।

मानसिंह शाहरंग चढ्यो रे जोगिया,

 अब दूजो चढ़सी नाँय ॥