।। गान ।।
राग सिन्धु, तर्ज "लोयण" । ताल कैरवा ।।
असल शराबी मुझे मत छेड़ो हे,
पीऊँ शराव रंग रलिया रे लोय ।। टेय ।।
अर्ध ऊर्ध बिच भठ्ठी खिणाई है,
ज्ञान रतन गुण गलिया रे लोय।
मन मदवे जुगत कर जोयो है,
मन निज मन होय रंलिया रे लोय ।। १ ।।
सुरत कलारी प्याला पावत है,
मस्त भये दुःख टलिया रे लोय ।।
घर की कलारी भट्ठी घर में है,
इत उत काहे को फिरियां रे लोय ।। २।।
मारूँ मरूँ डरूँ नहीं किण से है,
द्वैत का भय सव हरिया रे लोय।
शूर लड़ाकू खड्ग उठाया है,
नहीं कुछ टालाटूली करिया रे लोय ।। ३ ।।
तत् और त्वम् मेट दिये दोनूं हे,
असि पद हम खुद बणिया रे लोय ।
देवनाथ गुरु मानसिंह कहे,
वे आप आप में मिलिया रे लोय ।। ४ ।।