| 43121216560909087777 अवगुण चित न धरौ । समदरसी है नाम तुम्हारौ, सोई पार करौ । इक लोहा पूजा मैं राखत, इक घर बधिक परौ । सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ । इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ । जब मिलि गए तब एक बरन ह्वै . गंगा नाम परौ । तन माया,ज्यौं ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ ॥ कै इनकौ निरधार कीजियै, कै प्रन जात टरौ ॥11॥ 565465465658787809090 |
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Monday, October 2, 2023
अवगुण चित न धरौ ।
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