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Sunday, June 7, 2026

मानुस हौं तो वही रसखान
 बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
 जो पसु हौं तो कहा बस मेरो,
 चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥

 पाहन हौं तो वही गिरि को,
 जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
 जो खग हौं तो बसेरो करौं
 मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥


 या लकुटी अरु कामरिया पर,
 राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
 आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख,
 नंद की धेनु चराय बिसारौं॥

 रसखान कबौं इन आँखिन सों,
 ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
 कोटिक हू कलधौत के धाम,
 करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

 सेस गनेस महेस दिनेस,
 सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
 जाहि अनादि अनंत अखण्ड,
 अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥

 नारद से सुक व्यास रहे,
 पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं।
 ताहि अहीर की छोहरियाँ,
 छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥