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Monday, October 2, 2023

मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै ।

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  मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै ।
 जैसें उड़ि जहाज को पच्छी;
 फिरि जहाज पर आवै ।
 कलम-नैन कौ छाँड़ि महातम,
 और देव कौं ध्वावै ॥
 परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ,
 दुरमति कूप खनावै ।
 जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ,
 क्यौं करील-फल भावै ।
 सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि,
 छेरी कौन दुहावै ॥1॥
   
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