Monday, June 8, 2026

 कभी कभी भगवान् को भी
 भक्तों से काम पड़े ।
 जाना था गंगा पार
प्रभु केवट की नाव चढ़े ॥

 अवध छोड़ प्रभु वन को धाये,
 सिया राम लखन गंगा तट आये ।

 केवट मन ही मन हर्षाये,
 घर बैठे प्रभु दर्शन पाए ।
 हाथ जोड़ कर प्रभु के
आगे केवट मगन खड़े ॥

 प्रभु बोले तुम नाव चलाओ,
 अरे पार हमे केवट पहुँचाओ ।
 केवट बोला सुनो हमारी,
 चरण धुल की माया भारी ।

 मैं गरीब नैया मेरी नारी ना होए पड़े ॥
 चली नाव गंगा की धारा,
 सिया राम लखन को पार उतारा ।
 प्रभु देने लगे नाव उतराई,
 केवट कहे नहीं रगुराई ।

 पार किया मैंने तुमको,
 अब तू मोहे पार करे ॥
 केवट दोड़ के जल भर ले आया,
 चरण धोये चरणामृत पाया ।

 वेद ग्रन्थ जिन के गुण गाये,
 केवट उनको नाव चढ़ाए ।
 बरसे फूल गगन से ऐसे,
 भक्त के भाग्य जगे ॥