| किण सँग खेलूँ होली, पिया तज गये हैं अकेली।। 54654645dfdfdf माणिक मोती सब हम छोड़े गल में पहनी सेली। भोजन भवन भलो नहिं लागै, पिया कारण भई गेली। मुझे दूरी क्यूं म्हेली। अब तुम प्रीत अवरू सूं जोड़ी hhggh55465hghghgf हमसे करी क्यूं पहेली। बहु दिन बीते अजहु न आये, लग रही तालाबेली। किण बिलमाये हेली। स्याम बिना जियड़ो सुरझावे, जैसे जल बिना बेली। मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीज्यो, जनम जनम को चेली। दरस बिन खड़ी दुहेली।। vbvcbvcbcbvbbcvbcvbb6 |
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