Monday, October 2, 2023

किण सँग खेलूँ होली

           
  किण सँग खेलूँ होली,
 पिया तज गये हैं अकेली।।
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 माणिक मोती सब हम छोड़े
 गल में पहनी सेली।

 भोजन भवन भलो नहिं लागै,
 पिया कारण भई गेली।
 मुझे दूरी क्यूं म्हेली।
 अब तुम प्रीत अवरू सूं जोड़ी
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 हमसे करी क्यूं पहेली।
 बहु दिन बीते अजहु न आये,
 लग रही तालाबेली।
 किण बिलमाये हेली।

 स्याम बिना जियड़ो सुरझावे,
 जैसे जल बिना बेली।
 मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीज्यो,
 जनम जनम को चेली।
 दरस बिन खड़ी दुहेली।।
 
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