गुरां सा शरण आपके आया।
(श्री रोयल साहबजी ) [ मध्यमा ]
गुरां सा शरण आपके आया।
दिल की दुविधा रही ना कोई,
दर्द मिटया सुख पाया ॥ टेर ॥
ज्ञान भाण घट अन्दर उगा
अखै जोत लिव लाया।
जिन कारण जग फिरे उदासी
सो घट भीतर पाया ॥
काम क्रोध का दागा नहीं लागे,
मोह व्यापे नहीं माया।
करम क्लेश लेश नहीं उनके,
सोहम शहर बसाया ॥
आद अन्त का भय नहीं मेरे,
चित्त चेतन में लाया।
कर सिंवरण घट परचा पाया
फेर धरुँ नहीं काया ॥
पंछी का खोज मीन का मारग
सतगुरु मोही लखाया।
'रोयल' रतन अमोलक लादा
गुरां सा शरण आपके आया।
दिल की दुविधा रही ना कोई,
दर्द मिटया सुख पाया ॥ टेर ॥
ज्ञान भाण घट अन्दर उगा
अखै जोत लिव लाया।
जिन कारण जग फिरे उदासी
सो घट भीतर पाया ॥
काम क्रोध का दागा नहीं लागे,
मोह व्यापे नहीं माया।
करम क्लेश लेश नहीं उनके,
सोहम शहर बसाया ॥
आद अन्त का भय नहीं मेरे,
चित्त चेतन में लाया।
कर सिंवरण घट परचा पाया
फेर धरुँ नहीं काया ॥
पंछी का खोज मीन का मारग
सतगुरु मोही लखाया।
'रोयल' रतन अमोलक लादा
भाग बड़ा जिन पाया।