सन्त माली लिखमीदास जी की बाणी
( मध्यमा)
सन्ता बिना निवण कुण तिरिया
आदू अन्त निवण पद मोटो,
साद संतां री क्रिया । ।टेर ॥
नाभ कमल में चेतन चौको,
मनपति आसन धरिया ।
आसन मार अडिग होय बैठा,
अजपा सुमिरन करिया ॥ १ ॥
निवण-२ म्हारा माता-पिता ने,
उत्पत्ति पालन करिया ।
निवण-२ इस धरती माता ने
जिसके ऊपर फिरिया ॥ २ ॥
निवण-२ म्हारा गुरुदेव ने,
हृदय उजाला करिया
निवण-२ इण सत संगत ने,
इसमें बैठ सुधरिया ।।३ ॥
निवण-२ म्हारा अन्न देवता ने,
जिससे ओदर भरिया ।
बिना पाल भवसागर भरिया,
गुरु चरणां उबरिया
गुरु खिंवजी के शरणे "लिखमो "
फेरा चौरासी का टलिया ॥ ६ ॥