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Tuesday, April 15, 2025

ऐ बहार-ए-बाग़ दुनिया चंद रोज़ -Khayal-e-Akbar

Bagh-e-Khayal-e-Akbar

ऐ बहार-ए-बाग़ दुनिया चंद रोज़ 
देख लो इस का तमाशा चंद रोज़

 ऐ मुसाफ़िर कूच का सामान कर
 इस सरा में है बसेरा चंद रोज़ 

 दफ़्न कर के क़ब्र में बोली क़ज़ा 
अब यहाँ तुम सोते रहना चंद रोज

 है नुमाइश इस जहाँ की इस तरह
 जैसे नौ-चंदी का मेला चंद रोज़ 

 ग़ाफ़िलो याद-ए-इलाही चाहिए
 है बखेड़ा ज़िंदगी का चंद रोज़ 

 क्यों सताते हो किसी मजबूर को
 ज़ालिमो ये है ज़माना चंद रोज़