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Friday, July 24, 2026

।। सवैया ।।

दौड़ ही दौड़ के जात संन्यत में जो

 माँग के खानों तो यहीं पर खावो ।

जो न कमाने की हो शक्ति तो 

माँगो भला कोई नहीं अटकावो ।


संन्यस्त करो संन्यस्त करो 

इन में कहा कुछ निहाल करावो ।

गृहस्थी रहो और संन्यस्त करो तो 

संन्यस्त को आनन्द सो तुम पावो ।


व्यवहार के वाण लगे सो सहो

 सब डर के दूर अलग मत जावो ।

गृहस्थ के बीच संन्यस्त बने वो 

ऐसो वने कि फिर न उतरावो ।।


गुरु देवनाथ ने गृहस्थ संन्यस्त को

 भेद हमें सत सत समझावो ।

मान को जान पड़ी जव ही

 इस गृहस्थ के वीच संन्यस्त कमावो ।।