।। सवैया ।।
दौड़ ही दौड़ के जात संन्यत में जो
माँग के खानों तो यहीं पर खावो ।
जो न कमाने की हो शक्ति तो
माँगो भला कोई नहीं अटकावो ।
संन्यस्त करो संन्यस्त करो
इन में कहा कुछ निहाल करावो ।
गृहस्थी रहो और संन्यस्त करो तो
संन्यस्त को आनन्द सो तुम पावो ।
व्यवहार के वाण लगे सो सहो
सब डर के दूर अलग मत जावो ।
गृहस्थ के बीच संन्यस्त बने वो
ऐसो वने कि फिर न उतरावो ।।
गुरु देवनाथ ने गृहस्थ संन्यस्त को
भेद हमें सत सत समझावो ।
मान को जान पड़ी जव ही
इस गृहस्थ के वीच संन्यस्त कमावो ।।