i राग सोरठ-गिरनारी। ताल कैरवा ।।
अगम घर देश है रे जोगिया,
बिना प्राण विन जाय।। टेर ।।
मैं आसिक उण देश रा रे जोगिया,
वा घर कोई न आय।
उण घर वो नर आवसी रे जोगिया,
जिनको जीवन नांय ।। १ ।।
जीवतड़ा कई पच मार्यो रे जोगिया,
गिणती कौन लगाय।
जिण जिण मन मुड़दा किया रे जोगिया,
वे अब चूके नाँय ॥ २ ॥
चोरी करे फिर चोर नहीं रे जोगिया,
अवल साहूकार रहाय।
वो चोरा ने मार ले रे जोगिया
असली फकर कहाय ।।३ ।।
जाग्रत सुपन सुपुपति रे जोगिया,
सव इण माँय समाय
तुरिया में सेहजे बसे रे जोगिया,
सुरत लिबी अटकाय ॥४ ।।
जीव ब्रह्या कछ रयोनही रे जोगिया,
क्या है कछु न बताय।
नामी अनामी क्या कहे रे जोगिया,
बचन विलास थक जाय ॥५।।
देवनाथ गर महज मिल्या रे जोगिया,
सह्न में सह्न समाय ।
मान जोग और अजोग नही र जोगिया,
वो घर पीव मिलाय ।।६ ।।