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Saturday, June 13, 2026

 गुरांजी मिलण रो पूरो चाव,
 उम्मेदी दिल में लाग रही ॥


 म्हारे उम्मेदी ऐसी लगी जी,
 निर्धानियां धन होय।
 बांझनार पुत्र ने तरसे,
 मैं तरसुं दाता तोय ॥

 नैया पड़ी मझधार में जी,
 अध बिच झोला खाय ।
 सतगुरु केवटिया हो कर
 म्हारी नैया नै पार लगाय॥


 सतगुरु मेरे समद हैं जी,
 मैं गलियन को नीर।
 उलट समद में मिल गई,
 कंचन भयो शरीर ॥

 जग रूठे तो रूठन दे,
 मेरे सतगुरु रूठे नांय।
 जो मेरे दाता राजी हों तो,
 रूठ्या मना लू करतार ॥


 गुरु गहरा गुरु भावरा
 गुरु देवन के देव।
 रामानन्द जीरा भणत कबीरा'
 केवल पायो उपदेश॥