गुरांजी मिलण रो पूरो चाव,
उम्मेदी दिल में लाग रही ॥
म्हारे उम्मेदी ऐसी लगी जी,
निर्धानियां धन होय।
बांझनार पुत्र ने तरसे,
मैं तरसुं दाता तोय ॥
नैया पड़ी मझधार में जी,
अध बिच झोला खाय ।
सतगुरु केवटिया हो कर
म्हारी नैया नै पार लगाय॥
सतगुरु मेरे समद हैं जी,
मैं गलियन को नीर।
उलट समद में मिल गई,
कंचन भयो शरीर ॥
जग रूठे तो रूठन दे,
मेरे सतगुरु रूठे नांय।
जो मेरे दाता राजी हों तो,
रूठ्या मना लू करतार ॥
गुरु गहरा गुरु भावरा
गुरु देवन के देव।
रामानन्द जीरा भणत कबीरा'
केवल पायो उपदेश॥
उम्मेदी दिल में लाग रही ॥
म्हारे उम्मेदी ऐसी लगी जी,
निर्धानियां धन होय।
बांझनार पुत्र ने तरसे,
मैं तरसुं दाता तोय ॥
नैया पड़ी मझधार में जी,
अध बिच झोला खाय ।
सतगुरु केवटिया हो कर
म्हारी नैया नै पार लगाय॥
सतगुरु मेरे समद हैं जी,
मैं गलियन को नीर।
उलट समद में मिल गई,
कंचन भयो शरीर ॥
जग रूठे तो रूठन दे,
मेरे सतगुरु रूठे नांय।
जो मेरे दाता राजी हों तो,
रूठ्या मना लू करतार ॥
गुरु गहरा गुरु भावरा
गुरु देवन के देव।
रामानन्द जीरा भणत कबीरा'
केवल पायो उपदेश॥