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Saturday, July 4, 2026
सदगुरू को कृष्ण कर जाणु , अब दूजा नाँय पिछाणूं ।।
करणी केसर, शील को चन्दन, प्रेम को पाणी आणूं । सुरत- शिला पर खूब घिसाऊँ, लेकर तिलक चढ़ाऊँ ॥ १ ॥ gfgfd sdsds ffd hggg भाव को भोजन, प्रीत को पाणी, ध्यान को धूप लगाऊँ । सुरत निरत दोउ भरत हाजरी, स्वाँस को पवन दुलाऊँ ।।२ ।।
कृष्ण शब्द को अर्थ बताऊँ, सबसे कहूँ प्रमाणू । पाँच पचीस को कृष कर डारे, सोई कृष्ण सत् मानूँ ।। ३ ।।
नाथ जलन्धर दादागुरु मेरे, जिनसे यह युक्ति जानूँ । देवनाथ गुरु मिले अविनाशी, कहे मान अस ठानूँ ॥ ४ ॥