करणी केसर, शील को चन्दन, प्रेम को पाणी आणूं । सुरत- शिला पर खूब घिसाऊँ, लेकर तिलक चढ़ाऊँ ॥ १ ॥ gfgfd sdsds ffd hggg भाव को भोजन, प्रीत को पाणी, ध्यान को धूप लगाऊँ । सुरत निरत दोउ भरत हाजरी, स्वाँस को पवन दुलाऊँ ।।२ ।।
कृष्ण शब्द को अर्थ बताऊँ, सबसे कहूँ प्रमाणू । पाँच पचीस को कृष कर डारे, सोई कृष्ण सत् मानूँ ।। ३ ।।
नाथ जलन्धर दादागुरु मेरे, जिनसे यह युक्ति जानूँ । देवनाथ गुरु मिले अविनाशी, कहे मान अस ठानूँ ॥ ४ ॥