Sunday, June 7, 2026

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं,
 विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं,
चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌ ।।


 निराकार मोंकार मूलं तुरीयं,
गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌ ।
 करालं महाकाल कालं कृपालुं,
गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌ ।।

 तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं,
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌ ।
 स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा,
लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा ।।


 चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं,
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्‌ ।
 मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं,
प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ।।

 प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं,
अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌ ।
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं,
भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्‌ ।।

 कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी,
सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी ।
 चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी,
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ।।

 न यावद् उमानाथ पादारविन्दं,
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्‌ ।
 न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं,
 प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ।।

 न जानामि योगं जपं नैव पूजा,
 न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌ ।
 जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं,
प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ।।

 रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये
 ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति ।।

 इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं
श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम्