Thursday, June 4, 2026

 जब दर पे तुम्हारे ही अधमों का ठिकाना है।



जब दर पे तुम्हारे ही
 अधमों का ठिकाना है।
 फिर मेरी किस्मत में ही
 क्यों रंज उठाना है॥


 तारोगे तो तर लेंगे,
 छोड़ोगे तो बैठे हैं।
 दरबार से अब हरगिज
 उठकर नहीं जाना है॥


 मेरी तो कोई करनी
 निभने की नहीं भगवन।
 जैसे भी निभाओ अब
 तुमको ही निभाना है॥


 फरियाद को सुनने में है
कौन सिवा तुम्हारे।
 गर तुम न सुनो मेरी
 फिर किसको सुनना है॥


 दृग ‘बिन्दु’ की शक्लों में है
 ख्वाहिश इस दिल की।
                                        जरिया तो है आँखों की                                                                  
आंसू का बहाना है।