Thursday, June 4, 2026

कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी।


 कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी।
 तो सूनी ही रहती अदालत तुम्हारी।


 ओ दीनों के दिल में जगह तुम न पाते।
 तो किस दिल में होती हिफाजत तुम्हारी।


 ग़रीबों की दुनिया है आबाद तुमसे।
 ग़रीबों से है बादशाहत तुम्हारी।

 न मुल्जिम ही होते न तुम होते हाकिम।
 न घर-घर में होती इबादत तुम्हारी।


 तुम्हारी उल्फ़त के दृग ‘बिन्दु’ हैं वे।
 तुम्हें सौंपते है अमानत तुम्हारी।