राजा मानसिंह की वाणी
विनती अपने पुत्र की,
माता लीज्यो जान ।
आज्ञा अकबर शाह की,
काबुल चढि़या मान ।।
बीच अटक दरिया बाहै,
जल की ना परनाम ।
जल में सेना न उतरै, (गर)
लौटे अपना मान ।।
रघुकुल तिलक, ढूंढा़ङ रवि,
चिरंजीव प्रिय भान ।
यवन दमन कर लेहु जस,
रहियो जब लग भान ।।
रण में खड्ग चलाइया,
कुल की ओर निहार ।
एक वार शत्रु करै,
आरत हाहाकार ।।
सोच न करियो मौत को,
माता तब बलि जाय ।
जो रण त्यागे शत्रु डर,
मुख दिखलाजो नांय ।।