Sunday, October 1, 2023

जीभ ही सब सुख दुख री जड़ है।

        ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ        
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 जीभ ही सब सुख दुख री जड़ है।
अणी वश राखै सोई बड़ है |

जड़ चेतन रो नाम करै या,
चौ आंगळ चामड़ है।
दो बत्तीसां मांय दबाई,
तो पण जावै कड़ है ॥

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विष अमृत रो वास अणीमें,
 ई में ही चढ़ पड़ है।
 ईशूं मलै हेत कर कर'नै
 ईंखूं जावै लड़ है॥

 ज्ञान कर्म नै जळ अगनी,
या चारां री चोपड़ है।
 ईंशूं फरै नरोगी देही,
ईशूं जावै पड़ है॥


 या संतोष करै कोरी में,
या चावै चोपड़ है।
 याही केवै सांच पादरी,
 याही झूठी घड़ है ॥

आखो ही आधीन अणरै,
गुण तीनां रो गढ़ है।
या संजीवन बूंटी है या,
 सड़य्यो नकामो खड़ है॥


ई कबाण रा वचन बाण शुं,
भमै नहीं सो भड़ है।
कान्यां कामधेनु है याही,
बुरी ढोर बांगड़ है॥ 
 
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          ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ