Saturday, June 6, 2026


    बजरंगबली हनुमान साठिका

 तुलसीदासरचित हनुमान साठिका

 जय जय जय हनुमान अडंगी ।
 महावीर विक्रम बजरंगी ॥

 जय कपीश जय पवन कुमारा ।
 जय जगबन्दन सील अगारा ॥

 जय आदित्य अमर अबिकारी ।
 अरि मरदन जय-जय गिरधारी ॥

 अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा ।
 जय-जयकार देवतन कीन्हा ॥

 बाजे दुन्दुभि गगन गम्भीरा ।
 सुर मन हर्ष असुर मन पीरा ॥

 कपि के डर गढ़ लंक सकानी ।
 छूटे बंध देवतन जानी ॥

 ऋषि समूह निकट चलि आये ।
 पवन तनय के पद सिर नाये ॥

 बार-बार अस्तुति करि नाना ।
 निर्मल नाम धरा हनुमाना ॥

 सकल ऋषिन मिलि अस मत ठाना ।
 दीन्ह बताय लाल फल खाना ॥

 सुनत बचन कपि मन हर्षाना ।
 रवि रथ उदय लाल फल जाना ॥

 रथ समेत कपि कीन्ह अहारा ।
 सूर्य बिना भए अति अंधियारा ॥

 विनय तुम्हार करै अकुलाना ।
 तब कपीस की अस्तुति ठाना ॥

 सकल लोक वृतान्त सुनावा ।
 चतुरानन तब रवि उगिलावा ॥

 कहा बहोरि सुनहु बलसीला ।
 रामचन्द्र करिहैं बहु लीला ॥

 तब तुम उन्हकर करेहू सहाई ।
 अबहिं बसहु कानन में जाई ॥

 असकहि विधि निजलोक सिधारा ।
 मिले सखा संग पवन कुमारा ॥

 खेलैं खेल महा तरु तोरैं ।
 ढेर करैं बहु पर्वत फोरैं ॥

 जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई ।
 गिरि समेत पातालहिं जाई ॥

 कपि सुग्रीव बालि की त्रासा ।
 निरखति रहे राम मगु आसा ॥

 मिले राम तहं पवन कुमारा ।
 अति आनन्द सप्रेम दुलारा ॥

 मनि मुंदरी रघुपति सों पाई ।
 सीता खोज चले सिरु नाई ॥

 सतयोजन जलनिधि विस्तारा ।
 अगम अपार देवतन हारा ॥

 जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा ।
 लांघि गये कपि कहि जगदीशा ॥

 सीता चरण सीस तिन्ह नाये ।
 अजर अमर के आसिस पाये ॥

 रहे दनुज उपवन रखवारी ।
 एक से एक महाभट भारी ॥

 तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा ।
 दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा ॥

 सिया बोध दै पुनि फिर आये ।
 रामचन्द्र के पद सिर नाये।

 मेरु उपारि आप छिन माहीं ।
 बांधे सेतु निमिष इक मांहीं ॥

 लछमन शक्ति लागी उर जबहीं ।
 राम बुलाय कहा पुनि तबहीं ॥

 भवन समेत सुषेन लै आये ।
 तुरत सजीवन को पुनि धाये ॥

 मग महं कालनेमि कहं मारा ।
 अमित सुभट निसिचर संहारा ॥

 आनि संजीवन गिरि समेता ।
 धरि दीन्हों जहं कृपा निकेता ॥

 फनपति केर सोक हरि लीन्हा ।
 वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा ॥

 अहिरावण हरि अनुज समेता ।
 लै गयो तहां पाताल निकेता ॥

 जहां रहे देवि अस्थाना ।
 दीन चहै बलि काढ़ि कृपाना ॥

 पवनतनय प्रभु कीन गुहारी ।
 कटक समेत निसाचर मारी ॥

 रीछ कीसपति सबै बहोरी ।
 राम लषन कीने यक ठोरी ॥

 सब देवतन की बन्दि छुड़ाये ।
 सो कीरति मुनि नारद गाये ॥

 अछयकुमार दनुज बलवाना ।
 कालकेतु कहं सब जग जाना ॥

 कुम्भकरण रावण का भाई ।
 ताहि निपात कीन्ह कपिराई ॥

 मेघनाद पर शक्ति मारा ।
 पवन तनय तब सो बरियारा ॥

 रहा तनय नारान्तक जाना ।
 पल में हते ताहि हनुमाना ॥

 जहं लगि भान दनुज कर पावा ।
 पवन तनय सब मारि नसावा।

 जय मारुत सुत जय अनुकूला ।
 नाम कृसानु सोक सम तूला ॥

 जहं जीवन के संकट होई ।
 रवि तम सम सो संकट खोई ॥

 बन्दि परै सुमिरै हनुमाना ।
 संकट कटै धरै जो ध्याना ॥

 जाको बांध बामपद दीन्हा ।
 मारुत सुत व्याकुल बहु कीन्हा ॥

 सो भुजबल का कीन कृपाला ।
 अच्छत तुम्हें मोर यह हाला ॥

 आरत हरन नाम हनुमाना ।
 सादर सुरपति कीन बखाना ॥

 संकट रहै न एक रती को ।
 ध्यान धरै हनुमान जती को ॥

 धावहु देखि दीनता मोरी ।
 कहौं पवनसुत जुगकर जोरी ॥

 कपिपति बेगि अनुग्रह करहु ।
 आतुर आइ दुसै दुख हरहु ॥

 राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया ।
 जवन गुहार लाग सिय जाया ॥

 यश तुम्हार सकल जग जाना ।
 भव बन्धन भंजन हनुमाना ॥

 यह बन्धन कर केतिक बाता ।
 नाम तुम्हार जगत सुखदाता ॥

 करौ कृपा जय जय जग स्वामी ।
 बार अनेक नमामि नमामी ॥

 भौमवार कर होम विधाना ।
 धूप दीप नैवेद्य सुजाना ॥

 मंगल दायक को लौ लावे ।
 सुन नर मुनि वांछित फल पावे ॥

 जयति जयति जय जय जग स्वामी ।
 समरथ पुरुष सुअन्तरजामी ॥

 अंजनि तनय नाम हनुमाना ।
 सो तुलसी के प्राण समाना ॥

 । दोहा ।
जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान ॥
 राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण ॥

बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान ॥
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण ॥

 जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि ।
 रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि ।
सवैया ।
आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ
 सुनो विनती मम भारी ।
 अंगद औ नल-नील महाबलि देव
 सदा बल की बलिहारी ॥
 जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत
 दिबिद मयंद महा भटभारी ।
 दुःख दोष हरो तुलसी जन-को
 श्री द्वादश बीरन की बलिहारी ॥

 गोस्वामीतुलसीदासरचित हनुमान साठिका