Thursday, June 4, 2026

 सन्तो परखो हाट हमारी।

     परखो-हाट (श्री गिरधर साहेब जी ) [ परा ]


 सन्तो परखो हाट हमारी।
 मेरी हाट में सत्त का सौदा,
ले लो समझ विचारी । टेर।

 पाँच तत्व त्रिगुण के बारे,
हाट लगाई न्यारी।
निर्गुण सर्गुण के बारे
बिणजूं वहां आवे व्यापारी ॥


 सिरगुण सौदा में नहीं बिणजूं
नहीं निरगुण निराकारी ।
 निर्गुण, सिरगुण पार परखले,
वहां है हाट हमारी ॥

अभे भव माया वहां नहीं है,
तत्त प्रकृति टाली ।
त्रिकुटी चवदा वहाँ नहीं है,
 कोई अवध विचारी ॥


 वाणी पाँच अवस्था नहीं
नाम रूप से न्यारी।
 एक न दोय कुछ न दर से,
 न कोई थारी मारी ॥


खटनो चतुर अठारे नहीं है,
महावाक ना चारी
 गिरधर साहिब सत्त का सौदा
करे सन्त सच यारी।