सन्तो परखो हाट हमारी।
परखो-हाट (श्री गिरधर साहेब जी ) [ परा ]
सन्तो परखो हाट हमारी।
मेरी हाट में सत्त का सौदा,
ले लो समझ विचारी । टेर।
पाँच तत्व त्रिगुण के बारे,
हाट लगाई न्यारी।
निर्गुण सर्गुण के बारे
बिणजूं वहां आवे व्यापारी ॥
सिरगुण सौदा में नहीं बिणजूं
नहीं निरगुण निराकारी ।
निर्गुण, सिरगुण पार परखले,
वहां है हाट हमारी ॥
अभे भव माया वहां नहीं है,
तत्त प्रकृति टाली ।
त्रिकुटी चवदा वहाँ नहीं है,
कोई अवध विचारी ॥
वाणी पाँच अवस्था नहीं
नाम रूप से न्यारी।
एक न दोय कुछ न दर से,
न कोई थारी मारी ॥
खटनो चतुर अठारे नहीं है,
महावाक ना चारी
गिरधर साहिब सत्त का सौदा
करे सन्त सच यारी।