सन्त उपाराम जी की वाणी [परा ]
साधो भाई भेदी भेद निहारा।
जाणी जाण लिया निरधोके,
अब डर नहीं लिंगारा । टेिर ॥
गुरू की शोभा गाय सुणाऊँ,
गुरु है अगम अपारा।
- अगम गायो गुरु को,
साधक किया विचारा 1१।
गुरु अविगत अविनासी एकरस,
गुरु का सकल पसारा।
सब में सत्ता रहे निरबन्धन,
अकथ जाण करतारा २
गुरु की महर हुई जिन ऊपर
कारज 'सभी सुधारा।
भक्तिदान अभय पद सूंप्या,
ऐसा गुरु दातारा ॥३।
सुर नर असुर भेष सब वरणे,
महिमा अगम अपारा।
गुरु बिन मुक्ति होवे नहीं किसकी,
ये साँचा इतवारा १४ ।
बनानाथ गुरु चेतन देवा,
सब को जानन हारा
'उमाराम' गुरु पद परस्या,
आवागवण निवारा ५।