Sunday, June 7, 2026


                      
 राम को देख कर के जनक नंदिनी,
 बाग में वो खड़ी की खड़ी रह गयी ।
राम देखे सिया को सिया राम को,
 चारो अँखिआ लड़ी की लड़ी रह गयी ॥

 थे जनक पुर गये देखने के लिए,
सारी सखियाँ झरोखो से झाँकन लगे ।
 देखते ही नजर मिल गयी प्रेम की,
जो जहाँ थी खड़ी की खड़ी रह गयी ॥

 राम को देख कर के जनक नंदिनी…॥

 बोली एक सखी राम को देखकर,
रच गयी है विधाता ने जोड़ी सुघर ।
 फिर धनुष कैसे तोड़ेंगे वारे कुंवर,
मन में शंका बनी की बनी रह गयी ॥


राम को देख कर के जनक नंदिनी…॥

 बोली दूसरी सखी छोटन देखन में है,
फिर चमत्कार इनका नहीं जानती ।
एक ही बाण में ताड़िका राक्षसी,
उठ सकी ना पड़ी की पड़ी रह गयी ॥

राम को देख कर के जनक नंदिनी…॥

 राम को देख कर के जनक नंदिनी,
 बाग में वो खड़ी की खड़ी रह गयी ।
राम देखे सिया को सिया राम को,
चारो अँखिआ लड़ी की लड़ी रह गयी ॥