Saturday, June 6, 2026

बण जा रे वीरा राम जी को दासा,

अब छोड़ जगत वाली आशा। 

१ नो दश मास गर्भ के भीतर

 करियो नरक निवास ,

बाहर आकर भूल गयो ,

थारे  छावे  भोग विलासा। 

२ खाटा  रे मीठा थारे भोजन छावे

 बिस्तर छावे  खासा ,

याम का दूत पकड़ ले जासी 

डाल गला  में फाँसा। 

३ घर की डेल तक त्रिया का नाता

 पलसा तक तेरी माता ,

शमशाना  तक मित्र संगेती 

हंस अकेला जाता। 

४ हाड़ जले चन्दन की लकड़ी 

केश जले ज्यू घास ,

सोना जैसी काया जल गई

 कोई नहीं आवे पासा। 

5 लाख चोरिसि में भटकत

 मिटी न मन की त्रासा , 

कहत कबीर सुनो भाई साधु

ये दुनिया का रासा।