रंगमहल के दस दरवाज़े
रंगमहल के दस दरवाज़े ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी सय्याँ निकस गये मैं ना लड़ी थी
सर को झुकाये मैं तो चुपके खड़ी थी सय्याँ निकस गये मैं ना लड़ी थी
पिया कौन गली गये श्याम मोरी सुध ना लीन्हीं हाय राम
पिया कौन गली गये श्याम
अंग मेरे गहने प्यासी उमरिया जोगन हो गई मैं बिन सँवरिया
हाथों में मेरे मेहंदी रची थी मेहंदी में मेरे अँसुवन की लड़ी थी
सय्याँ निकस गये मैं ना लड़ी थी
छोड़ पिया घर नैहर जाऊँ वंदे हरि अब सीश झुकाऊँ
कर सिंगार मैं दुल्हन बनी थी ऐसी दुल्हन से कुँवारी भली थी सय्याँ निकस गये मैं ना लड़ी थी
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