तू चेतन खुदा खुद आप है ,
फिर धरता किसका ध्याना।
तू चेतन खुदा खुद आप है ,
फिर धरता किसका ध्याना।
तू ही खंड ओर पिण्ड बखाना ,
तू ही ब्रम्हांड में जोत जगाना ,
बाहर भीतर क्यूँ भटकाना।
जपता किसका जाप ,
सब माया माही भुलाना।
तू चेतन खुदा खुद आप है ,
फिर धरता किसका ध्याना
तू ही ईश्वर ब्रह्मः कहाना ,
तू ही आतम परमातम माना ,
सगुण निर्गुण तू ही ठहराना।
कहाँ गया घर घाप रे ,
तज दे सर्व अज्ञाना।
तू चेतन खुदा खुद आप है ,
फिर धरता किसका ध्याना।
तुझ से भीन्न कहो कह ज्ञाना ,
जाग्रत जान पारख स्थाना ,
गाफिल दशा को दूर हटाना।
दूजा न कोई बाप है ,
नित समय स्वरूप समाना
तू चेतन खुदा खुद आप है ,
फिर धरता किसका ध्याना।
अमर अलौकिक रूप तुम्हारा ,
जनम मरण माया से न्यारा ,
सत्य सनातन संत पुकारा ,
गरिबा ज्ञान अताप है ,
नित ज्यूँ का त्यूं बलवाना।
तू चेतन खुदा खुद आप है ,