अवधू जागत नींद न कीजै।
काल न खाइ कलप नहीं ब्यापै
देही जुरा न छीजै॥टेक॥
उलटी गंग समुद्रहि सोखै
ससिहर सूर गरासै।
नव ग्रिह मारि रोगिया बैठे,
जल में ब्यंब प्रकासै॥
डाल गह्या थैं मूल न सूझै
मूल गह्याँ फल पावा।
बंबई उलटि शरप कौं लागी,
धरणि महा रस खावा॥
बैठ गुफा मैं सब जग देख्या,
बाहरि कछू न सूझै।
उलटैं धनकि पारधी मार्यौ
यहु अचिरज कोई बूझै॥
औंधा घड़ा न जल में डूबे,
सूधा सूभर भरिया।
जाकौं यहु जुग घिण करि चालैं,
ता पसादि निस्तरिया॥
अंबर बरसै धरती भीजै,
बूझै जाँणौं सब कोई।
धरती बरसै अंबर भीजै,
बूझै बिरला कोई॥
गाँवणहारा कदे न गावै,
अणबोल्या नित गावै।
नटवर पेषि पेषनाँ पेषै,
अनहद बेन बजावै॥
कहणीं रहणीं निज तत जाँणैं
यहु सब अकथ कहाणीं।
धरती उलटि अकासहिं ग्रसै,
यहु पुरिसाँ की बाँणी॥
बाझ पिय लैं अमृत सोख्या,
नदी नीर भरि राष्या।
कहै कबीर ते बिरला जोगी,
धरणि महारस चाष्या॥