Monday, June 8, 2026

 अकथ कहाँणी प्रेम की, 

कछु कही न जाई,

गूँगे केरी सरकरा, 

बैठे मुसुकाई॥टेक॥

भोमि बिनाँ अरु बीज बिन,

 तरवर एक भाई।

अनँत फल प्रकासिया, 

गुर दीया बताई।

कम थिर बैसि बिछारिया, 

रामहि ल्यौ लाई।

झूठी अनभै बिस्तरी 

सब थोथी बाई॥

कहै कबीर सकति कछु नाही, 

गुरु भया सहाई॥

आँवण जाँणी मिटि गई,

 मन मनहि समाई॥