मन ! तोहे केहि विध कर समझाऊं ।
सोना होय तो सुहाग मंगाऊं,
बंकनाल रस लाऊं ।
ग्यान शब्द की फूंक चलाऊं,
पानी कर पिघलाऊं ॥१॥
घोड़ा होय तो लगाम लगाऊं,
ऊपर जीन कसाऊं ।
होय सवारे तेरे पर बैठूं,
चाबुक देके चलाऊं ॥२॥
हाथी होय तो जंजीर गढ़ाऊं,
चारों पैर बंधाऊं ।
होय महावत तेरे पर बैठूं,
अंकुश लेके चलाऊं ॥३॥
लोहा होय तो एरण मंगाऊं,
ऊपर ध्रुवन ध्रुवाऊं ।
ध्रुवन की घनघोर मचाऊं,
जंतर तार खिंचाऊं ॥४॥
ग्यानी होय तो ज्ञान सिखाऊं,
सत्य की राह चलाऊं ।
कहत कबीर सुनो भाई साधू,
अमरापुर पहुंचाऊं ॥५॥
मन ! तोहे केहि विध कर समझाऊं ।