Sunday, June 7, 2026

 मन ! तोहे केहि विध कर समझाऊं 

सोना होय तो सुहाग मंगाऊं, 

बंकनाल रस लाऊं ।

ग्यान शब्द की फूंक चलाऊं, 

पानी कर पिघलाऊं ॥१॥

घोड़ा होय तो लगाम लगाऊं, 

ऊपर जीन कसाऊं ।

होय सवारे तेरे पर बैठूं, 

चाबुक देके चलाऊं ॥२॥

हाथी होय तो जंजीर गढ़ाऊं, 

चारों पैर बंधाऊं ।

होय महावत तेरे पर बैठूं, 

अंकुश लेके चलाऊं ॥३॥

लोहा होय तो एरण मंगाऊं, 

ऊपर ध्रुवन ध्रुवाऊं ।

ध्रुवन की घनघोर मचाऊं, 

जंतर तार खिंचाऊं ॥४॥

ग्यानी होय तो ज्ञान सिखाऊं, 

सत्य की राह चलाऊं ।

कहत कबीर सुनो भाई साधू, 

अमरापुर पहुंचाऊं ॥५॥

मन ! तोहे केहि विध कर समझाऊं ।