Sunday, June 7, 2026

 दीनबन्धु दीनानाथ, 

मेरी तन हरिये ॥

भाई नाहिं, बन्धु नाहिं, 

कटुम-परिवार नाहिं ।

ऐसा कोई मीत नाहिं, 

जाके ढिंग जाइये ॥

खेती नाहिं, बारी नाहिं, 

बनिज ब्योपार नाहिं

ऐसो कोउ साहु नाहिं

 जासों कछू माँगिये ॥

कहत मलूकदास छोड़ि 

दे पराई आस,

राम धनी पाइकै अब 

काकी सरन जाइये ॥