अलख कहै सो आलसी
चतुरसिंह जी बावजी
अलख कहै सो आलसी, लख के वे नादान |
अलख लखी रो आसरो, उद्या अलख पिछाण ।।
बकरी चरगी नार ने, पालो पाती जांण ।
वीं बकरी रो ग्वाल है, उद्या अलख पछाण ।।
कागद कीड़ी रे जश्यो, वीं में वेद कुराण |
वीं में अक्षर एक नी, उद्या अलख पिछाण ।।
बाहर केवे बावला, अंतर कहे अजाण ।
बाहर अंतर एक सो, उदग्या अलख पिछाण ।।
देबारी में उदयपुर, उदियापुर में राण
वीरेराण दिवाण है, उद्या अलख पिछाण ।।
देखूं देखूं छोड़ने, दीखूं दूखूं ठांण।
ई दूखूं रो देखणों, उद्या अलख पिछाण।।
जाणे सोही जाणसी, या अण जाणी जाण ।
नीतर ऊंधी ताणसी, उद्या अलख पिछाण ।।
सुखा चणनै सामटा, काचा सूप गोळ
वो दन वीसरणो नहीं, लाल रंग री लोळ ॥
रेल दोड़ती ज्यूं घणा, रूख दोड़ता देख ।
तन नै जातो जाण यूं दन नै जातो देख॥
पड़ी दड़ी पहचाण लै, घड़ी व्है घाट ।
काढैगा कतराक दन, वना तेल री वाट ॥
जणी जणी नै जोय मत, ध्यान धणी रो खोय।
वणी अणी री वगत में, कूण कणी रो होय ॥
कई काठ ने क़िस्त दे, किस्त काळ री टाळ ।
झूठी बाजी जीत' नै मनख जनम मत हार ॥
गोखड़िया अड़िया रया, कड़िया आंकणहार ।
खड़खड़िया पड़िया रया, खड़िया हाकणहार ॥
गेला नै जोतो कहै, जावै आप अजाण ।
गेला ने रेवै नहीं, गेला री पछाण ॥
कर क्षणभंग शरीर रो, मलणो धूल कबूल ।
पापी रा पग पै कई फूल रियौ रे भूल ॥
धन दारा रै मांयने, मती जमारो खोय ।
वणी अणी रा वगत में, कूण कणी रा होय ॥
धरम धरम सब एक है, पण वरताव अनेक
ईए जाणणो धरम है, जीरो पंथ विवेक ॥
पर घर पण नी मेळणी वना मान मनवार
अंजन आये देखने, सिंगल से सतकार ॥
वणी सूत री सींदरी, वणी सूत री पाग
बंधवा बंधवा में फरक, जरयो जणी से भाग ॥
उपजे आपो आप ही भाग प्रमाणे लाग
कोइक पीटे ताकियां, कोइक खेचें खाग ॥
मते मोकळा मनख पण मले न मनखाचार।
फोगट फोनोग्राफ ज्यू वातां रो बेवार