साधी भाई मैं हूँ पुरुष पुराना।
श्री मांगारामजी ) [ अपरोक्ष पद ]
साधी भाई मैं हूँ पुरुष पुराना।
आना जाना मुझ में नाही,
सदा रहूँ गलताना ।
ढेर पिण्ड ब्रह्माण्ड से न्यारा खेलूं,
नहीं ज्ञान विज्ञाना।
कर्ता कर्म से मैं हूँ न्यारा,
पाप पुण्य नहीं माना ॥
भाव अभाव मुझ में नहीं,
नहीं धरता में ध्याना।
दृष्टा दृष्य का मैं हूँ साक्षी,
सदा रहूँ मस्ताना ॥
अजर अमर अखण्डित चेतन,
व्यापक सबमें समाना।
मरण का लेश न मुझ में
नहीं लाभ नहीं होना ॥
शब्द सैन धुन नहीं लागे,
पहुँचे नकाल कबाना।
मांगूराम आत्म सत्त चेतन,
शुद्ध स्वरूप रहाना ॥