Tuesday, June 9, 2026

श्री प्रतापरामजी [ मध्यमा ]

साधो भाई सतसंग अमृत धारा।
 निर्मलनीर सीर ज्यारी शीतल,
 बरसे अमी फैवारा टै।

 सतसंग करे संत मरजीवा
 मेटे भरम विकारा।
 नित आनन्द मगन रहे मन में,
 परसे प्रीतम प्यारा ।


खम सन्तोष कर्म धार हृदय में
 छोड़ मोह अहंकारा।
दसो दोष निकट नहीं आवे,
 उज्जवल करे तन सारा ॥

 भक्ति भाव जहाँ प्रेम अपरवल,
 नहीं जीत नहीं हारा।
सतसंग पावे भाग पुरबला
 श्रीमुख आप उचारा ॥


करता केल पहल मिल हँसा,
 मोती शब्दों का चारा ।
उत्तम मध्यम कनिष्ट तारे,
देवें शब्द गुन्जारा ॥

 संत गम्भीर भरिया है पूरण
 ऊंडा अति है अपारा।
जो कोई ध्यान धरे निशि बासरे
 भव से होय किनारा ॥


 खेताराम गुरू परम विधाता
मिलिया मोय दातारा ।
 कहे प्रताप कृपा सतसंग की
 जाग्या भाग हमारा ॥