श्री प्रतापरामजी [ मध्यमा ]
साधो भाई सतसंग अमृत धारा।
निर्मलनीर सीर ज्यारी शीतल,
बरसे अमी फैवारा टै।
सतसंग करे संत मरजीवा
मेटे भरम विकारा।
नित आनन्द मगन रहे मन में,
परसे प्रीतम प्यारा ।
खम सन्तोष कर्म धार हृदय में
छोड़ मोह अहंकारा।
दसो दोष निकट नहीं आवे,
उज्जवल करे तन सारा ॥
भक्ति भाव जहाँ प्रेम अपरवल,
नहीं जीत नहीं हारा।
सतसंग पावे भाग पुरबला
श्रीमुख आप उचारा ॥
करता केल पहल मिल हँसा,
मोती शब्दों का चारा ।
उत्तम मध्यम कनिष्ट तारे,
देवें शब्द गुन्जारा ॥
संत गम्भीर भरिया है पूरण
ऊंडा अति है अपारा।
जो कोई ध्यान धरे निशि बासरे
भव से होय किनारा ॥
खेताराम गुरू परम विधाता
मिलिया मोय दातारा ।
कहे प्रताप कृपा सतसंग की
जाग्या भाग हमारा ॥